तेंदूपत्ता बना सिरदर्द! बीजापुर के जंगलों में सूखा, मजदूर खाली हाथ लौटे

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तेंदूपत्ता बना सिरदर्द!  बीजापुर के जंगलों में सूखा, मजदूर खाली हाथ लौटे

👉 बस्तर संभाग में सिर्फ 43.62% ही हुआ संग्रहण

👉 बीजापुर की हालत सबसे खराब, लक्ष्य से मीलों दूर

👉 सरकार की 5500 करोड़ की योजना पर सवाल

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में तेंदूपत्ता इस बार मुसीबत बन गया है। जंगलों से जो उम्मीद थी, वह इस बार बिखर गई। बीजापुर जैसे नक्सल प्रभावित ज़िले में तेंदूपत्ता संग्रहण का हाल बेहाल है। यहां अब तक सिर्फ 10.2% संग्रहण ही हो पाया है, जो प्रदेश भर में सबसे कम है।

सरकार ने इस साल 5.5 लाख मानक बोरा (बंडल) का लक्ष्य तय किया था, लेकिन मई के अंत तक केवल 2.4 लाख बंडल ही जुटाए जा सके हैं। बाकी जंगलों में या तो पत्ता सूख गया या फिर मज़दूरों को उचित मेहनताना नहीं मिलने से वे जंगलों से लौट आए।

5500 करोड़ की योजना पर लगी ग्रहण!

तेंदूपत्ता छत्तीसगढ़ के वनांचल क्षेत्रों के लिए जीवनरेखा माना जाता है। यही वो पत्ता है जिससे हजारों परिवारों की रोटी जुड़ी है। राज्य सरकार हर साल इस पर हज़ारों करोड़ खर्च करती है—संग्रहण, बोनस, बीमा, भंडारण और विपणन पर। लेकिन जब पत्ते ही नहीं जुटे, तो इस पूरी योजना पर सवाल खड़े हो गए हैं।

बीजापुर सबसे नीचे, कांकेर सबसे आगे

बीजापुर – केवल 10.2% संग्रहण, महज 6.31 लाख पत्ते

कांकेर – सबसे आगे, 77.99% संग्रहण

दंतेवाड़ा – 74.03%

नारायणपुर – 74.91%

सुकमा – 72.93%

बस्तर – 88.17%

कोण्डागांव – 79.99%

कम संग्रहण = बड़ा नुकसान

कम संग्रहण से न सिर्फ सरकारी राजस्व घटा है, बल्कि गांवों में रोज़गार और बोनस जैसे लाभ भी ठप हो गए हैं। बीजापुर में जिन मजदूरों को प्रति पत्ता भुगतान मिलना था, वे हफ्तों से खाली बैठे हैं।

मौसम, मैनेजमेंट या मजदूरों की नाराजगी?

विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार का कमजोर संग्रहण कई कारणों से हुआ:

मौसम की मार से पत्ते जल्दी सूख गए

मजदूरों को समय पर भुगतान नहीं मिला

कई जगह समिति स्तर पर अव्यवस्था

नक्सली क्षेत्रों में सुरक्षा कारणों से संग्रहण ठप

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