बांदा (उत्तर प्रदेश): विशेष POCSO न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला, दंपती को मृत्युदंड
बांदा (उत्तर प्रदेश): विशेष POCSO न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला, दंपती को मृत्युदंड
उत्तर प्रदेश के बांदा स्थित विशेष POCSO न्यायालय ने नाबालिग बच्चों के विरुद्ध किए गए जघन्य और अमानवीय यौन अपराधों के एक बड़े मामले में ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। न्यायालय ने पति-पत्नी रामभवन और दुर्गावती को 33 नाबालिग बालकों के साथ गंभीर यौन अपराधों का दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह मामला “रेयरेस्ट ऑफ द रेयर” की श्रेणी में आता है, जिसमें कठोरतम सजा ही न्याय के उद्देश्यों को पूरा कर सकती है।
यह मामला 31 अक्टूबर 2020 को दर्ज एक प्राथमिकी
(एफआईआर) से सामने आया था। एफआईआर में आरोपियों पर अप्राकृतिक यौन कृत्य, गंभीर पैठ वाले यौन अपराध, बच्चों का अश्लील उद्देश्यों के लिए उपयोग, बच्चों से संबंधित अश्लील सामग्री का संग्रह, अपराध के लिए उकसावा और आपराधिक षड्यंत्र जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। प्रारंभिक जांच के बाद मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपी गई।
CBI ने गहन जांच के पश्चात 10 फरवरी 2021 को रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी रामभवन सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के पद पर कार्यरत रह चुका था और अपने पद तथा सामाजिक पहचान का दुरुपयोग कर बच्चों और उनके परिवारों का भरोसा जीतता था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपियों ने वर्षों तक योजनाबद्ध तरीके से 33 नाबालिग बालकों को निशाना बनाया। ये अपराध न केवल एक स्थान तक सीमित थे, बल्कि आरोपी अलग-अलग जिलों में सक्रिय रहकर बच्चों को अपने जाल में फंसाते रहे। अदालत के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों से यह स्पष्ट हुआ कि आरोपी उत्तर प्रदेश के बांदा और चित्रकूट क्षेत्रों में लगातार ऐसे अपराध करते रहे।
न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि यह कोई एकल या तात्कालिक अपराध नहीं था, बल्कि लंबे समय तक चलने वाला, सुनियोजित और अत्यंत क्रूर आपराधिक कृत्य था। अदालत ने पीड़ितों को हुई शारीरिक और मानसिक क्षति को अत्यंत गंभीर मानते हुए कहा कि कई पीड़ितों को यौन उत्पीड़न के दौरान उनके गुप्तांगों में गंभीर चोटें आईं, जिनमें से कुछ को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। कुछ बच्चों में स्थायी स्वास्थ्य समस्याएं विकसित हो गईं, जिनमें आंखों से संबंधित समस्या (भेंगापन) भी शामिल है।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि इन अपराधों का प्रभाव केवल शारीरिक चोटों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पीड़ितों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा आघात पहुंचा। कई पीड़ित आज भी उस भय, पीड़ा और मानसिक यातना से उबर नहीं पाए हैं, जो उन्हें आरोपियों द्वारा दी गई। न्यायालय ने कहा कि ऐसे अपराध समाज की आत्मा को झकझोर देते हैं और बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं।
अपने फैसले में विशेष POCSO न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बच्चों के खिलाफ इस प्रकार के जघन्य अपराधों में समाज को एक सशक्त संदेश देना आवश्यक है। अदालत ने कहा कि यदि ऐसे मामलों में कठोरतम सजा नहीं दी जाती, तो यह न केवल पीड़ितों के साथ अन्याय होगा, बल्कि भविष्य में अपराधियों का मनोबल भी बढ़ेगा।
इस निर्णय को बाल अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यह फैसला न केवल पीड़ित बच्चों के लिए न्याय है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक कड़ा संदेश भी है कि नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराध किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे।
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