Tomar Brothers case in police trouble: तोमर ब्रदर्स केस में पुलिस की फजीहत: 90 दिन बाद भी गिरफ्तारी अधूरी, विपक्ष हमलावर
तोमर ब्रदर्स की फरारी पर सवाल: 90 दिन बाद भी गिरफ्तारी से दूर पुलिस, विपक्ष बोला – राजनीति का संरक्षण
रायपुर। राजधानी रायपुर के कुख्यात तोमर ब्रदर्स – वीरेंद्र तोमर और रोहित तोमर – की फरारी को पूरे 90 दिन बीत चुके हैं। मारपीट, वसूली, ब्लैकमेलिंग और अवैध कारोबार जैसे गंभीर मामलों में आरोपित दोनों भाई अब तक पुलिस की पकड़ से बाहर हैं। वहीं, पुलिस लगातार दावा कर रही है कि उनकी तलाश की जा रही है और टीमों को अलग-अलग राज्यों में भेजा गया है। बावजूद इसके, अब तक कोई सफलता हाथ नहीं लगी है।
90 दिन में 380 अपराधियों पर कार्रवाई, लेकिन तोमर ब्रदर्स फरार
जून से अगस्त के बीच राजधानी रायपुर और आसपास के इलाकों में पुलिस ने ताबड़तोड़ कार्रवाई की। चोरी, हत्या, लूट, तस्करी, चाकूबाजी और साइबर अपराध में शामिल करीब 380 से अधिक गुंडे और बदमाशों को जेल भेजा गया। भारी मात्रा में अवैध शराब, ड्रग्स और हथियार जब्त किए गए। यहां तक कि 70 से ज्यादा वारंटी आरोपी भी पकड़े गए।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि पुलिस के तमाम हाईटेक अभियान और सर्च ऑपरेशन के बावजूद तोमर ब्रदर्स का कोई सुराग नहीं मिल पाया।
कौन हैं तोमर ब्रदर्स?
वीरेंद्र और रोहित तोमर का नाम राजधानी में मारपीट, वसूली और ब्लैकमेलिंग जैसे मामलों में लंबे समय से जुड़ा हुआ है। जून के महीने में लगातार दर्ज मामलों ने दोनों की मुश्किलें बढ़ाईं। इसके बाद से दोनों फरार हैं। पुलिस ने कोर्ट के आदेश पर कुर्की की कार्रवाई भी की और उनके दफ्तर को नगर निगम ने तोड़फोड़ कर “कठोर कार्रवाई” का संदेश देने की कोशिश की। लेकिन हकीकत यह है कि इस कदम से दोनों भाइयों पर कोई खास असर नहीं पड़ा।
क्या मिल रहा है राजनीतिक संरक्षण?
शहर में चर्चा है कि दोनों भाइयों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। यही वजह है कि पुलिस चाहकर भी उन्हें गिरफ्तार नहीं कर पा रही। सूत्रों का कहना है कि दोनों भाई लगातार अपने परिजनों के संपर्क में हैं और संभवतः पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश में शरण लिए हुए हैं।
विपक्षी कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने तोमर ब्रदर्स को बचाने के लिए पुलिस पर दबाव बनाया हुआ है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि “पुलिस बिक चुकी है और मोटी रकम लेकर सरकार के इशारे पर आरोपियों को संरक्षण दे रही है।”
पुलिस की छवि पर उठे सवाल
रायपुर पुलिस को देश की सबसे “स्मार्ट और हाईटेक पुलिस” कहकर प्रचारित किया जाता है। लेकिन राजधानी के ही दो कुख्यात आरोपियों को पकड़ने में विफलता से पुलिस की साख पर सवाल खड़े हो गए हैं। जनता में चर्चा है कि जब 3 महीने बाद भी पुलिस दोनों भाइयों को गिरफ्तार नहीं कर पाई, तो यह उसकी नाकामी है।
कानून-व्यवस्था पर सीधा असर दिख रहा है। आम नागरिक यह सवाल पूछ रहे हैं कि “जब राजधानी में बैठे अपराधी खुलेआम राजनीतिक संरक्षण में घूम सकते हैं, तो आम आदमी कैसे सुरक्षित रहेगा?”
नगर निगम की कार्रवाई सिर्फ दिखावा?
हाल ही में नगर निगम ने तोमर ब्रदर्स के कार्यालय को गिरा दिया था। यह ऑफिस कथित तौर पर “गैरकानूनी निर्माण” पर बना था। कार्रवाई का उद्देश्य यह संदेश देना था कि सरकार और प्रशासन अपराधियों को बख्शेगा नहीं।
लेकिन जानकारों का मानना है कि सिर्फ टीन की दीवारें गिरा देने से अपराधियों को कोई फर्क नहीं पड़ा। वे अब भी खुलेआम फरार हैं और पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं कर पा रही।
कोर्ट के आदेश भी बेअसर
कोर्ट ने तोमर ब्रदर्स की संपत्ति कुर्क करने और नोटिस चिपकाने के आदेश दिए। पुलिस ने उनके घर और संपत्तियों पर नोटिस भी चिपकाए। लेकिन तीन महीने बाद भी यह आदेश केवल कागजों तक सीमित रह गया है। आरोपियों की गिरफ्तारी न होना इस बात का संकेत है कि या तो पुलिस पूरी तरह नाकाम है या फिर जानबूझकर आंखें मूंदे हुए है।
विपक्ष का वार, सरकार पर दबाव
कांग्रेस लगातार इस मुद्दे पर सरकार को घेर रही है। विपक्ष का कहना है कि भाजपा सरकार “भ्रष्टाचार और अपराधियों से सांठगांठ” कर रही है।
कांग्रेस नेताओं ने कहा, “तोमर ब्रदर्स की गिरफ्तारी न होना इस बात का सबूत है कि सरकार अपराधियों को संरक्षण दे रही है। यह पुलिस और प्रशासन की नाकामी ही नहीं, बल्कि जनता के भरोसे के साथ विश्वासघात भी है।”
भाजपा के लिए चुनौती
भाजपा सरकार के लिए यह मामला अब एक बड़ी चुनौती बन गया है। अगर आने वाले दिनों में पुलिस तोमर ब्रदर्स को गिरफ्तार नहीं कर पाती, तो यह विपक्ष के लिए एक बड़ा चुनावी हथियार साबित हो सकता है। भाजपा को अपनी छवि बचाने और जनता का विश्वास जीतने के लिए इस मामले में सख्त कार्रवाई करनी होगी।
जनता में गुस्सा और निराशा
आम नागरिकों में यह धारणा बन गई है कि अपराधियों पर सख्ती केवल “छोटे बदमाशों” तक सीमित है, जबकि बड़े और राजनीतिक संबंध वाले आरोपी कानून से बच जाते हैं।
लोग कह रहे हैं कि जब 380 अपराधियों की गिरफ्तारी हो सकती है, तो मात्र दो आरोपियों को पकड़ना इतना मुश्किल क्यों है?
अब नजरें पुलिस पर
कुल मिलाकर, तोमर ब्रदर्स का मामला पुलिस और सरकार दोनों की साख के लिए लिटमस टेस्ट बन गया है। अगर आने वाले दिनों में गिरफ्तारी नहीं होती, तो यह न केवल विपक्ष को मजबूत मुद्दा देगा, बल्कि आम जनता के बीच भी सरकार की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाएगा।
मायने
तोमर ब्रदर्स की गिरफ्तारी न होना सिर्फ दो आरोपियों की फरारी का मामला नहीं, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की कानून-व्यवस्था, पुलिस की क्षमता और राजनीतिक हस्तक्षेप पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। अब देखना होगा कि क्या रायपुर पुलिस वाकई “स्मार्ट पुलिस” साबित कर पाएगी, या फिर यह मामला लंबे समय तक राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बना रहेगा।
What's Your Reaction?
Like
1
Dislike
0
Love
0
Funny
1
Angry
1
Sad
1
Wow
0