धर्मांतरण का खौफनाक सच: मां के अंतिम संस्कार से बेटे ने किया इनकार, 1100 किमी दूर से आई नातिन ने निभाई अंतिम जिम्मेदारी

The horrifying truth of conversion: Son refused to perform the last rites of his mother, granddaughter came from 1100 km away and performed the last rites धर्मांतरण का खौफनाक सच: मां के अंतिम संस्कार से बेटे ने किया इनकार, 1100 किमी दूर से आई नातिन ने निभाई अंतिम जिम्मेदारी
 0
धर्मांतरण का खौफनाक सच: मां के अंतिम संस्कार से बेटे ने किया इनकार, 1100 किमी दूर से आई नातिन ने निभाई अंतिम जिम्मेदारी

धर्मांतरण का खौफनाक सच: मां के अंतिम संस्कार से बेटे ने किया इनकार, 1100 किमी दूर से आई नातिन ने निभाई अंतिम जिम्मेदारी

ग्वालियर। धर्मांतरण किस कदर रिश्तों और संस्कारों को तोड़ सकता है, इसकी एक मार्मिक और चौंकाने वाली घटना ग्वालियर में सामने आई है। यहां सरोज देवी का दो दिन पहले निधन हो गया। उनके बेटे ने ईसाई धर्म अपना लिया था और मां के अंतिम संस्कार को हिंदू रीति-रिवाज से करने से इनकार कर दिया। समाज के वरिष्ठ लोगों ने लाख समझाने की कोशिश की, लेकिन उसने अपनी मां का मुखाग्नि देने से भी मना कर दिया।

जब यह खबर सरोज देवी की नातिन श्वेता सुमन को मिली, तो वह झारखंड से 1100 किलोमीटर दूर से ग्वालियर पहुंची और अपनी नानी का अंतिम संस्कार हिंदू विधि-विधान से किया। उसने अपनी जिम्मेदारी निभाकर समाज को एक मजबूत संदेश दिया।

धर्मांतरण के बाद मां से नफरत

ग्वालियर निवासी धीरेंद्र प्रताप सिंह ने कुछ समय पहले ईसाई धर्म अपना लिया था। नाम बदलकर डेविड रख लिया। धर्मांतरण के बाद से ही वह अपने परिवार और समाज से दूरी बनाने लगा था। जब मां का निधन हुआ, तो उसने उनकी अंतिम क्रिया करने से साफ इनकार कर दिया।

समाज में रोष, परिवार में दुख

डेविड के इस फैसले से समाज के लोगों में गहरा रोष है। वरिष्ठ जनों ने कहा कि ऐसी घटनाएं समाज के ताने-बाने को तोड़ने का काम कर रही हैं। धर्मांतरण के लालच और भ्रमजाल में लोग अपने संस्कार, रिश्ते और कर्तव्य भूल जाते हैं।

वीर सावरकर के कथन की याद

इस घटना ने एक बार फिर वीर सावरकर के उस कथन को सच्चा साबित किया जिसमें उन्होंने कहा था

"धर्मांतरण वास्तव में राष्ट्रांतरण का ही दूसरा नाम है।"

आज जब धर्म के नाम पर लोगों को बहकाया जा रहा है, ऐसे मामलों से समाज को जागरूक होना चाहिए।

श्वेता बनी मिसाल

श्वेता सुमन ने नानी के संस्कार की जिम्मेदारी लेकर न सिर्फ अपने परिवार बल्कि समाज के सामने भी एक आदर्श प्रस्तुत किया। उसने बताया कि संस्कार और संस्कृति से बड़ा कोई धर्म नहीं, और अपने कर्तव्य को कभी नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

धर्मांतरण सनातन धर्म का अभिशाप

धर्मांतरण के पीछे छिपे खतरे और इसके सामाजिक परिणामों पर गंभीर मंथन की जरूरत है। सरकार और समाज को मिलकर ऐसी घटनाओं पर सख्त रुख अपनाना चाहिए ताकि परिवार, समाज और संस्कृति को बचाया जा सके।

What's Your Reaction?

Like Like 1
Dislike Dislike 0
Love Love 1
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0