तीन साल तक पिता को छोड़ गए बेटे, मुआवज़े की ख़बर पर लौटे… गाँव के दरवाज़े पर मिली चौंकाने वाली सूचना

Sons left their father for three years, returned on hearing the news of compensation… Shocking information was received at the door of the villageतीन साल तक पिता को छोड़ गए बेटे, मुआवज़े की ख़बर पर लौटे… गाँव के दरवाज़े पर मिली चौंकाने वाली सूचना
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तीन साल तक पिता को छोड़ गए बेटे, मुआवज़े की ख़बर पर लौटे… गाँव के दरवाज़े पर मिली चौंकाने वाली सूचना

तीन साल तक पिता को छोड़ गए बेटे, मुआवज़े की ख़बर पर लौटे… गाँव के दरवाज़े पर मिली चौंकाने वाली सूचना

रामपुर (झारखंड)। झारखंड के रामपुर गाँव में 75 वर्षीय बुज़ुर्ग शंकर की कहानी ने पूरे इलाके को झकझोर दिया है। पत्नी के निधन के बाद वह पिछले कई सालों से गाँव में अकेले रह रहे थे। उनके तीन बेटे — रवि, अमित और कुणाल — मुंबई में बस गए और तीन साल तक न तो गाँव लौटे, न ही हालचाल पूछा।

शुरुआत में कुछ त्योहारों पर तोहफ़े भेजे गए, लेकिन धीरे-धीरे संपर्क टूट गया। शंकर के पास बस उनका छोटा-सा घर, कुछ मुर्गियाँ और एक बूढ़ा कुत्ता ही साथी थे। उम्र के कारण उनकी सेहत बिगड़ चुकी थी। एक बार तो वह घर के सामने गिर पड़े और रेंगते हुए गाँव के दरवाज़े तक पहुँचे मदद के लिए।

हाल ही में, गाँव की ज़मीन के लिए 5 लाख रुपये प्रति मीटर के मुआवज़े की योजना की ख़बर फैली। यह सुनकर तीनों बेटे परिवार समेत महँगी एसयूवी में गाँव लौट आए। उनके साथ उनकी पत्नियाँ और बच्चे भी थे, हाथों में तरह-तरह के तोहफ़े।

गाँव के प्रवेश द्वार पर उनका सामना गाँव के मुखिया चाचा प्रदीप से हुआ, जो पहले से उनका इंतज़ार कर रहे थे। मुखिया का चेहरा गंभीर था, आवाज़ ठंडी—

"तुम लोग देर से आए हो… बहुत देर से।"

इसके बाद जो बात सामने आई, उसने तीनों बेटों को स्तब्ध कर दिया — उनके पिता शंकर का कुछ दिन पहले ही देहांत हो चुका था। गाँव के लोग फुसफुसा रहे थे, “अब लौटने का क्या फ़ायदा?”

इस घटना ने पूरे क्षेत्र में रिश्तों की अनदेखी और बुज़ुर्गों की उपेक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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