संविधान की हत्या के 50 वर्ष: जब सत्ता के मद में लोकतंत्र को कुचल दिया गया!

50 years of murder of Constitution: When democracy was crushed in the arrogance of power!संविधान की हत्या के 50 वर्ष: जब सत्ता के मद में लोकतंत्र को कुचल दिया गया!
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संविधान की हत्या के 50 वर्ष: जब सत्ता के मद में लोकतंत्र को कुचल दिया गया!

संविधान की हत्या के 50 वर्ष: जब सत्ता के मद में लोकतंत्र को कुचल दिया गया!

"विनाश काले विपरीत बुद्धि..! " — जयप्रकाश नारायण

नई दिल्ली।भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय — 25 जून 1975। आज ठीक 50 वर्ष बाद भी देश उस रात की सिहरन और सत्ता के घमंड को भूला नहीं पाया है, जब सत्ता बचाने के लिए संविधान, नागरिक अधिकार और लोकतंत्र को तिलांजलि दे दी गई थी।

पृष्ठभूमि : हाईकोर्ट का फैसला और सत्ता की बौखलाहट

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध करार दे दिया। फैसले के बाद प्रधानमंत्री निवास 1, सफदरजंग रोड पर खलबली मच गई। सत्ता को बचाने और विपक्ष को कुचलने की योजना वहीं से संजय गांधी के इशारे पर बननी शुरू हो गई।

संजय गांधी ने कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों से कहा — "इंदिरा गांधी के समर्थन में विशाल रैलियां करो।" मुख्यमंत्रियों में भीड़ जुटाने की होड़ मच गई। 18 जून को दिल्ली में मुख्यमंत्रियों की बैठक में इंदिरा गांधी की खुलकर तारीफ की गई।

विपक्ष भी मैदान में

उधर, जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में विपक्ष भी तैयार था। 21-22 जून को जनता मोर्चा की बैठक में इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग के साथ राष्ट्रव्यापी आंदोलन का फैसला लिया गया।

20 जून : इंदिरा के समर्थन में रैली और गुज़राल-संजय का टकराव

20 जून को दिल्ली में सरकारी तंत्र की मदद से कांग्रेस ने इंदिरा गांधी के समर्थन में बड़ी रैली की। इसमें कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने कहा —

> "इंदिरा, तेरे सुबह की जय, तेरे शाम की जय, तेरे काम की जय, तेरे नाम की जय।"

सूचना-प्रसारण मंत्री आई.के. गुज़राल ने इस रैली का प्रसारण दूरदर्शन पर रोक दिया, जिससे संजय गांधी भड़क उठे। अंततः गुज़राल को मंत्रालय छोड़ना पड़ा और उनकी जगह विद्याचरण शुक्ला को लाया गया।

आपातकाल की साजिश तैयार

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने इंदिरा गांधी को संविधान की धारा 19 (जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों की गारंटी देती है) को स्थगित करने का सुझाव दिया। इंदिरा गांधी, संजय गांधी, बंसीलाल, ओम मेहता, सिद्धार्थ रे, और हरिभाऊ गोखले ने मिलकर आपातकाल लगाने की योजना बनाई।

25 जून 1975 : रामलीला मैदान की ऐतिहासिक सभा

इस दिन रामलीला मैदान में विपक्ष ने बड़ी सभा की। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, नानाजी देशमुख, जॉर्ज फर्नांडीज समेत दिग्गज नेता मौजूद थे। जयप्रकाश नारायण ने सभा को संबोधित करते हुए कहा —

> "देश में नैतिकता की स्थापना के लिए जेल जाना पड़े तो कौन तैयार है?"

पूरा मैदान हाथ उठाकर गूंज उठा।

रात 11.45 बजे : आपातकाल पर हस्ताक्षर

सभा के समापन के बाद उसी रात 11.45 बजे इंदिरा गांधी राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से मिलीं। संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल लगाने के प्रस्ताव पर बिना किसी सवाल-जवाब के राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर दिए।

हिटलर की तरह लोकतंत्र का गला घोंटा

ऐसा ही कदम 1933 में हिटलर ने भी जर्मनी में उठाया था। इंदिरा गांधी ने हूबहू वही किया। देश में प्रेस की स्वतंत्रता, मौलिक अधिकार और विपक्ष की आवाज बंद कर दी गई।

जयप्रकाश नारायण की गिरफ्तारी

रात 1 बजे जयप्रकाश नारायण को उनके आवास से पुलिस ने गिरफ्तार किया। जाते-जाते उन्होंने सिर्फ इतना कहा —

> "विनाश काले विपरीत बुद्धि..! "

मायने

भारतीय लोकतंत्र की इस घटना ने सिद्ध किया कि सत्ता का घमंड जब लोकतंत्र पर हावी होता है, तो इतिहास उसे कभी माफ नहीं करता। 50 साल बाद भी 25 जून 1975 की रात देश की सबसे भयावह राजनीतिक घटना के रूप में याद की जाती है।

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