2813 प्राचार्य पदोन्नति मामले में न्यायालय में तीखी बहस, सूची पर लगी रोक

छत्तीसगढ़ में 2813 प्राचार्य पदोन्नति को लेकर उच्च न्यायालय में सुनवाई जारी है। याचिकाकर्ताओं ने सूची पर आपत्ति जताते हुए इसे नियमों के खिलाफ बताया है, जबकि शासन पक्ष ने 5 वर्षों के अनुभव को आधार मानते हुए प्रक्रिया को उचित ठहराया है। न्यायालय ने फिलहाल सूची पर रोक लगा दी है।
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2813 प्राचार्य पदोन्नति मामले में न्यायालय में तीखी बहस, सूची पर लगी रोक

छत्तीसगढ़ में शिक्षा विभाग द्वारा की गई प्राचार्य पदोन्नति प्रक्रिया पर विवाद गहराता जा रहा है। रायपुर उच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई अब चौथे दिन में प्रवेश कर चुकी है। यह मामला लगभग 2813 शिक्षकों की पदोन्नति से जुड़ा है, जिसमें वरिष्ठता और पात्रता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

विवाद की पृष्ठभूमि:

यह सुनवाई न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की एकल पीठ में चल रही है। 28 जुलाई से शुरू हुई सुनवाई में याचिकाकर्ताओं की ओर से 28 व 29 जुलाई को पक्ष रखा गया। वहीं शासन पक्ष की ओर से 30 और 31 जुलाई को दलीलें पेश की गईं। इसके साथ ही कुछ इंटरवीनरों को भी सुनवाई का मौका मिला।

शासन पक्ष का तर्क:

शासन का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त महाधिवक्ता यशवंत सिंह ठाकुर ने स्पष्ट किया कि मिडिल स्कूल में प्रधान पाठक के रूप में 5 वर्षों की सेवा को अनुभव मानते हुए पदोन्नति के लिए उपयुक्त माना गया है। साथ ही उन्होंने कहा कि व्याख्याता कोटे से प्रमोशन लेने वालों को वरिष्ठता का लाभ देने का कोई नियम नहीं है। इसी डायरेक्शन के आधार पर सूची तैयार की गई है।

याचिकाकर्ता की आपत्तियाँ:

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि वरिष्ठता सूची में अनुचित आधारों पर चयन किया गया है। उनका कहना है कि शासन ने जिस आधार पर सूची बनाई है, वह नियमों के विरुद्ध है। पहले प्रकाशित सूची पर आपत्ति जताई गई थी, जिसे खारिज कर दिया गया। उन्होंने पूरी सूची पर रोक लगाने की मांग की है।

स्थिति और परिणाम की प्रतीक्षा:

वर्तमान में कोर्ट ने सूची पर रोक लगा दी है और अगली सुनवाई में निर्णय की संभावना जताई जा रही है। यह मामला न केवल पदोन्नति प्रक्रिया पर सवाल उठाता है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में नियमों के पालन और पारदर्शिता की आवश्यकता को भी उजागर करता है।

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