religion and bribery in medical college धर्म के नाम पर लूट और मेडिकल कॉलेज में रिश्वतखोरी का धंधा: हाई कोर्ट ने खारिज की जमानत

धर्म के नाम पर लूट और मेडिकल कॉलेज में रिश्वतखोरी का धंधा: हाई कोर्ट ने खारिज की जमानत
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religion and bribery in medical college धर्म के नाम पर लूट और मेडिकल कॉलेज में रिश्वतखोरी का धंधा: हाई कोर्ट ने खारिज की जमानत

धर्म के नाम पर लूट और मेडिकल कॉलेज में रिश्वतखोरी का धंधा: हाई कोर्ट ने खारिज की जमानत

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर और उससे जुड़े शिक्षा जगत में एक बड़ा घोटाला सामने आया है। श्री रावतपुरा सरकार मेडिकल कॉलेज और उससे जुड़े मैनेजमेंट पर गंभीर आरोप लगे हैं। शिक्षा और मेडिकल के नाम पर चल रहा यह कथित "धंधा" अब न्यायालय की चौखट तक पहुँच चुका है। हाई कोर्ट ने इस मामले में आरोपी की नियमित जमानत को सख्ती से खारिज कर दिया है।

मामला क्या है?

दरअसल, श्री रावतपुरा सरकार मेडिकल कॉलेज को मान्यता दिलाने के नाम पर रिश्वतखोरी का बड़ा खेल सामने आया। सीबीआई ने इस मामले में छापेमारी कर कई आरोपियों को रंगे हाथ गिरफ्तार किया। आरोप है कि कॉलेज को मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की मान्यता दिलाने के लिए करोड़ों रुपए की वसूली की जा रही थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, कॉलेज प्रबंधन ने एनआरआई कोटा के नाम पर डेढ़-डेढ़ करोड़ रुपए तक वसूले। यही नहीं, जांच टीम को भी घूस देने की कोशिश की गई। सीबीआई ने इस पूरे मामले में बड़ा जाल बिछाकर कार्रवाई की।

55 लाख रिश्वत का मामला

सीबीआई की जांच में सामने आया कि 30 जून 2025 की रात 10:10 बजे डॉ. चैत्रा के पति रविचंद्र के. कथित रूप से आरोपी सतीशा ए. के घर पहुंचे और 16.62 लाख रुपए रिश्वत ली। इसके बाद छापेमारी में 38.38 लाख नकद जब्त किए गए। कुल मिलाकर यह रिश्वतखोरी 55 लाख रुपए से जुड़ी थी।

1 जुलाई 2025 को सीबीआई ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार किया और बेंगलुरु स्थित सीबीआई कार्यालय ले जाया गया। बाद में उन्हें विशेष सीबीआई कोर्ट, रायपुर में पेश किया गया।

आरोपी की जमानत पर सुनवाई

गिरफ्तारी के बाद आरोपी सतीशा ए. ने हाई कोर्ट में जमानत याचिका दायर की। उसने अपने वकील के जरिए बताया कि उसे कैंसर, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी गंभीर बीमारियाँ हैं। इलाज के लिए नियमित थेरेपी की आवश्यकता है। इसी आधार पर उसने नियमित जमानत की मांग की।

लेकिन कोर्ट ने सीबीआई की दलीलें सुनने के बाद साफ कहा कि भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी जैसे मामलों में इतनी आसानी से नियमित जमानत नहीं दी जा सकती। हालांकि, कोर्ट ने आरोपी की स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए दो महीने की अंतरिम जमानत दी ताकि वह अपना इलाज कर सके।

धर्मगुरु से कारोबारी तक

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा नाम सामने आया है – रवि शंकर प्रसाद उर्फ "रावतपुरा सरकार"। धार्मिक गुरु की छवि रखने वाले रावतपुरा सरकार पर आरोप है कि उन्होंने शिक्षा के नाम पर कारोबार का बड़ा जाल बिछाया।

रावतपुरा सरकार विश्वविद्यालय और रावतपुरा मेडिकल कॉलेज लंबे समय से विवादों में हैं। आरोप है कि यहाँ "डिग्रियां बांटने" का खेल चलता है। एनआरआई कोटा और एडमिशन के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती है।

बीते महीनों में सीबीआई ने रावतपुरा सरकार से जुड़े कई लोगों को गिरफ्तार किया। स्वयं रवि शंकर प्रसाद को भी आरोपी बनाया गया और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई।

हाई कोर्ट का सख्त संदेश

हाई कोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया कि अब शिक्षा और मेडिकल के नाम पर लूट करने वालों पर सख्ती होगी। अदालत ने यह भी माना कि आरोपी गंभीर बीमारियों से जूझ रहा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसे भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मामले में राहत दी जाए।

सीबीआई की पड़ताल और बरामदगी

सीबीआई की जांच में लगातार नए खुलासे हो रहे हैं। अब तक की कार्रवाई में बड़ी मात्रा में नकदी बरामद की जा चुकी है। साथ ही, कई दस्तावेज भी मिले हैं जिनसे पता चलता है कि मेडिकल कॉलेज और यूनिवर्सिटी के नाम पर पैसों का बड़ा खेल खेला जा रहा था।

शिक्षा जगत के लिए बड़ा सवाल

यह पूरा मामला सिर्फ एक कॉलेज या एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। असल सवाल यह है कि देशभर में मेडिकल कॉलेजों की मान्यता के नाम पर इस तरह का खेल कब तक चलता रहेगा?

क्या मेडिकल एजुकेशन अब पूरी तरह "मुनाफे का कारोबार" बन चुका है?

क्या भविष्य के डॉक्टर बनने वाले छात्रों से इस तरह वसूली जायज है?

और सबसे बड़ा सवाल – धर्म और आस्था की आड़ में "बाबा लोग" शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में कब तक दखल देते रहेंगे?

मायने

रावतपुरा सरकार मेडिकल कॉलेज से जुड़ा यह रिश्वतकांड शिक्षा जगत की सच्चाई को उजागर करता है। हाई कोर्ट का यह फैसला न केवल आरोपी के लिए बल्कि पूरे सिस्टम के लिए एक चेतावनी है। अब देखने वाली बात यह होगी कि आगे की सुनवाई में कोर्ट और सीबीआई किस तरह इस मामले को अंजाम तक पहुँचाते हैं।

यह केस साफ करता है कि मेडिकल और शिक्षा के नाम पर "लूट की दुकान" चलाने वालों के दिन अब गिनती के रह गए हैं।

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