पत्नी की कॉल डिटेल पाने की पति की याचिका खारिज, कहा – "विवाह साझेदारी है, स्वामित्व नहीं"हाईकोर्ट का अहम फैसला
हाईकोर्ट का अहम फैसला: पत्नी की कॉल डिटेल पाने की पति की याचिका खारिज, कहा – "विवाह साझेदारी है, स्वामित्व नहीं"
रायपुर/बिलासपुर, 17 जुलाई 2025 छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण आदेश में पति द्वारा पत्नी की कॉल डिटेल प्राप्त करने की याचिका को खारिज करते हुए निजता के अधिकार की पुष्टि की है। न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि विवाह एक साझेदारी का संबंध है, न कि स्वामित्व का। पति-पत्नी दोनों को व्यक्तिगत जीवन, संचार और गोपनीयता का पूरा अधिकार है।
मामला क्या था?
पति ने पारिवारिक अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए धारा 9 के तहत याचिका दायर की थी, वहीं पत्नी ने पति के खिलाफ भरण-पोषण की मांग करते हुए भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत आवेदन दिया। साथ ही, उसने पति के माता-पिता और भाई के खिलाफ घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत भी कार्यवाही की मांग की।
इसी दौरान पति ने अपनी पत्नी की कॉल डिटेल्स प्राप्त करने के लिए दुर्ग एसएसपी को आवेदन दिया, लेकिन जानकारी नहीं मिलने पर पहले पारिवारिक न्यायालय और फिर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
कोर्ट की टिप्पणी:
न्यायालय ने कहा कि विवाह विच्छेद की याचिका में न तो व्यभिचार और न ही किसी संदेह का कोई आरोप था, जिससे कॉल डिटेल की मांग का औचित्य नहीं बनता। अदालत ने कहा कि –
> "भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निजता का अधिकार सुरक्षित है, जिसमें मोबाइल पर हुई बातचीत भी शामिल है। किसी भी व्यक्ति की कॉल डिटेल, चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित, उसकी निजता का अभिन्न हिस्सा है और उसे बिना कानूनी औचित्य के उजागर नहीं किया जा सकता।"
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति अपनी पत्नी को मोबाइल फोन का पासवर्ड, बैंक डिटेल या अन्य गोपनीय जानकारी साझा करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। विवाह के रिश्ते में आपसी विश्वास और सहयोग की अपेक्षा होती है, लेकिन यह किसी के व्यक्तिगत अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकता।
पारिवारिक न्यायालय के फैसले को ठहराया सही
हाईकोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय द्वारा याचिका खारिज किए जाने के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि पत्नी की कॉल डिटेल मांगने का कोई संवैधानिक या वैधानिक आधार नहीं था। निजता का अधिकार सर्वोपरि है और इसका उल्लंघन सिर्फ गंभीर एवं प्रमाणित कारणों पर ही किया जा सकता है।
न्यायिक महत्व
यह निर्णय न केवल पति-पत्नी के व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा को मजबूत करता है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि डिजिटल युग में संचार माध्यमों की गोपनीयता को भी उसी गंभीरता से देखा जाना चाहिए जैसा किसी भी अन्य मौलिक अधिकार को।
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