हमले से पहले गूंजे थे देशभक्ति के तराने, फिर नक्सलियों ने बरपाया कहर: झीरमकांड के चश्मदीद का खुलासा
झीरम घाटी में 25 मई 2013 को हुए नक्सली हमले को 12 साल बीत चुके हैं, लेकिन उस दर्दनाक मंजर को आज भी चश्मदीद मलकीत सिंह नहीं भूल पाए हैं। Dainik Bhaskar से खास बातचीत में मलकीत ने उस दिन की भयावहता और ‘बस्तर टाइगर’ महेंद्र कर्मा के आखिरी पलों को याद किया।
हमले से पहले गूंजे थे महेंद्र कपूर के देशभक्ति गीत
मलकीत सिंह के मुताबिक, हमले से कुछ ही देर पहले महेंद्र कर्मा ने महेंद्र कपूर के देशभक्ति गीत मोबाइल पर सुन रहे थे। "मेरा रंग दे बसंती चोला..." जैसे गीतों की गूंज झीरम घाटी की खामोशी में गूंज रही थी। काफिले में मौजूद सभी नेताओं के चेहरे पर संतोष था, किसी को अंदेशा नहीं था कि मौत बस कुछ कदम दूर है।
नक्सलियों ने घात लगाकर किया हमला
सिर्फ चंद मिनटों में घाटी खून से लाल हो गई। करीब 250 नक्सलियों ने घात लगाकर कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हमला बोला। अंधाधुंध फायरिंग, धमाके और चीख-पुकार के बीच सब कुछ तहस-नहस हो गया।
महेंद्र कर्मा की लाश पर नाचा था एक नक्सली
मलकीत बताते हैं कि उन्होंने अपनी आंखों से देखा, जब महेंद्र कर्मा को गोली मारी गई, तब एक नक्सली ने उनकी लाश के ऊपर खड़े होकर नाच किया। "वो दृश्य ऐसा था जिसे कोई कभी नहीं भूल सकता," मलकीत की आंखें भर आईं।
हमले में कई नेताओं की गई थी जान
इस हमले में महेंद्र कर्मा समेत छत्तीसगढ़ कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं की जान गई थी। यह छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में गिना जाता है।
आज भी गूंजती हैं वो आवाजें
"आज भी जब महेंद्र कपूर का कोई गीत सुनता हूं, तो रूह कांप जाती है," मलकीत कहते हैं। 12 साल बाद भी झीरम घाटी का वह सन्नाटा, वह चीखें, और वह खून से सना रास्ता, सब कुछ वैसा ही याद है जैसे कल की बात हो।
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