आयुष्मान में 125 करोड़ के संदिग्ध क्लेम, 8 माह से फाइलें अटकीं
आयुष्मान योजना में 125 करोड़ के संदिग्ध क्लेम 8 माह से अटके, ऑडिट के बाद भी अस्पतालों को नहीं मिला भुगतान
रायपुर। छत्तीसगढ़ में आयुष्मान भारत योजना के तहत इलाज करने वाले अस्पतालों के लगभग 125 करोड़ रुपये के क्लेम पिछले आठ महीनों से लंबित पड़े हैं। खास बात यह है कि इन क्लेमों को मेडिकल ऑडिट कमेटी द्वारा जांच के बाद क्लियर भी कर दिया गया है, लेकिन इसके बावजूद अस्पतालों को भुगतान नहीं किया जा रहा है। इस देरी के कारण निजी और सरकारी दोनों तरह के अस्पतालों में असंतोष की स्थिति बनी हुई है।
जानकारी के अनुसार राज्य में पिछले साल आयुष्मान योजना के तहत किए गए इलाज के करीब 280 करोड़ रुपये के क्लेम को संदिग्ध मानते हुए खारिज कर दिया गया था। इसके अलावा करीब 125 करोड़ रुपये के क्लेम ऐसे थे जिन्हें पूरी तरह खारिज नहीं किया गया, बल्कि संदिग्ध मानकर मेडिकल ऑडिट कमेटी के पास जांच के लिए भेजा गया था। इन क्लेमों की विस्तृत जांच के बाद ऑडिट कमेटी ने कुछ मामलों में कटौती करते हुए अधिकांश क्लेमों को मंजूरी दे दी और भुगतान के लिए स्टेट नोडल एजेंसी को भेज दिया।
बताया जा रहा है कि मेडिकल ऑडिट कमेटी ने लगभग सवा सौ करोड़ रुपये के क्लेम को क्लियर करते हुए उनके भुगतान की सिफारिश कर दी थी। यह प्रक्रिया करीब आठ महीने पहले पूरी हो चुकी है। इसके बावजूद अब तक अस्पतालों को भुगतान नहीं किया गया है। इससे कई अस्पतालों की आर्थिक स्थिति पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है, क्योंकि आयुष्मान योजना के तहत बड़ी संख्या में मरीजों का इलाज इन्हीं अस्पतालों में किया जाता है।
सूत्रों के मुताबिक जिन क्लेमों को जांच के लिए भेजा गया था, उनमें से अधिकांश में गंभीर गड़बड़ी नहीं पाई गई थी। कई मामलों में सिर्फ तकनीकी त्रुटियां सामने आई थीं। जैसे कि क्लेम फॉर्म भरते समय कुछ जरूरी कॉलम सही तरीके से नहीं भरे गए थे या मरीजों के इलाज से जुड़ी जानकारी पूरी तरह दर्ज नहीं की गई थी। कुछ अस्पतालों ने इलाज में दी गई दवाओं और उपचार की प्रक्रिया का विस्तृत विवरण भी नहीं दिया था। इसी वजह से इन क्लेमों को संदिग्ध मानते हुए मेडिकल ऑडिट कमेटी के पास परीक्षण के लिए भेजा गया था।
स्वास्थ्य विभाग ने आयुष्मान योजना के क्लेमों की पारदर्शी जांच के लिए पिछले साल अगस्त में एक नया सिस्टम लागू किया था। इस सिस्टम के तहत मेडिकल ऑडिट कमेटी को अलग-अलग विभागों और बीमारियों के आधार पर विभाजित किया गया है। उदाहरण के तौर पर हड्डी से संबंधित इलाज के मामलों को अस्थि रोग विशेषज्ञों की कमेटी के पास भेजा जाता है, जबकि हार्ट, मेडिसिन, सर्जरी और पेट से जुड़ी बीमारियों के मामलों की जांच संबंधित विशेषज्ञों की अलग-अलग कमेटियों द्वारा की जाती है।
कमेटी में शामिल विशेषज्ञ पहले मरीज की केस हिस्ट्री और अस्पताल द्वारा दी गई जानकारी का परीक्षण करते हैं। इसके बाद जरूरत पड़ने पर संबंधित अस्पताल प्रबंधन से अतिरिक्त जानकारी भी ली जाती है। जांच पूरी होने के बाद ही क्लेम को मंजूरी दी जाती है या उसमें कटौती की जाती है।
हालांकि अब सवाल यह उठ रहा है कि जब मेडिकल ऑडिट कमेटी क्लेम को क्लियर कर चुकी है और भुगतान की सिफारिश भी कर दी गई है, तो फिर अस्पतालों को अब तक भुगतान क्यों नहीं किया गया। इस देरी के कारण आयुष्मान योजना से जुड़े अस्पतालों में नाराजगी बढ़ रही है। कई अस्पतालों का कहना है कि समय पर भुगतान नहीं होने से उनके लिए योजना के तहत मरीजों का इलाज जारी रखना मुश्किल हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही इन क्लेमों का भुगतान नहीं किया गया तो इसका असर आयुष्मान योजना की कार्यप्रणाली पर भी पड़ सकता है। ऐसे में जरूरत है कि स्टेट नोडल एजेंसी और स्वास्थ्य विभाग इस मामले में जल्द निर्णय लेकर अस्पतालों के लंबित भुगतान को जारी करें, ताकि योजना का लाभ लेने वाले मरीजों और इलाज करने वाले अस्पतालों दोनों को राहत मिल सके
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