अक्षय तृतीया पर परंपरा और आस्था का मेल: मिट्टी के खिलौनों की धूम, साहू समाज कराएगा 58 जोड़ों का विवाह
रायपुर। छत्तीसगढ़ में अक्षय तृतीया, जिसे स्थानीय भाषा में 'अक्ती तिहार' कहा जाता है, पारंपरिक आस्था और सांस्कृतिक उत्सव का प्रतीक है। इस दिन मिट्टी के गुड्डा-गुड़िया की शादी कराने की परंपरा है, जिसे 'पुतरा-पुतरी विवाह' कहा जाता है। यह बच्चों को विवाह संस्कारों की समझ देने और पारंपरिक मूल्यों से जोड़ने का माध्यम है।
इस अवसर पर बाजारों में मिट्टी के खिलौनों की मांग बढ़ जाती है। कुम्हारों द्वारा तैयार किए गए गुड्डा-गुड़िया की जोड़ी की कीमतें 50 से 100 रुपये के बीच होती हैं, और ये तेजी से बिकते हैं। राजधानी रायपुर सहित राज्य के विभिन्न हिस्सों में बाजारों में रौनक देखी जा सकती है।
अक्षय तृतीया को 'अबूझ मुहूर्त' माना जाता है, अर्थात इस दिन शुभ कार्यों के लिए विशेष मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए, इस दिन विवाह, गृह प्रवेश, भूमि पूजन, मुंडन, सगाई आदि मांगलिक कार्य संपन्न किए जाते हैं।
इस वर्ष, साहू समाज द्वारा 58 जोड़ों का सामूहिक विवाह आयोजित किया गया है। यह आयोजन सामाजिक एकता और सहयोग का प्रतीक है, जिसमें दूल्हा-दुल्हन को आवश्यक गृहस्थ जीवन की सामग्री भी भेंट की जाती है। कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ में अक्षय तृतीया का पर्व परंपरा, आस्था और सामाजिक समरसता का अद्भुत संगम है, जो राज्य की सांस्कृतिक विविधता और एकता को दर्शाता है।
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