परंपरा और आस्था जोरापारा के प्रह्लाद धाम में निसंतान दंपतियों की ‘गोद-भराई’ आज मान्यता: शयनकक्ष में भक्त प्रह्लाद की प्रतिमा रखने से होती है संतान प्राप्ति, पहले से लगवाना पड़ता है नंबर

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परंपरा और आस्था जोरापारा के प्रह्लाद धाम में निसंतान दंपतियों की ‘गोद-भराई’ आज मान्यता: शयनकक्ष में भक्त प्रह्लाद की प्रतिमा रखने से होती है संतान प्राप्ति, पहले से लगवाना पड़ता है नंबर

परंपरा और आस्था जोरापारा के प्रह्लाद धाम में निसंतान दंपतियों की ‘गोद-भराई’ आज

मान्यता: शयनकक्ष में भक्त प्रह्लाद की प्रतिमा रखने से होती है संतान प्राप्ति, पहले से लगवाना पड़ता है नंबर

रायपुर। होलिका दहन को लेकर शहर में जहां तैयारियां जोरों पर हैं, वहीं इससे जुड़ी धार्मिक आस्थाएं और परंपराएं भी जीवंत रूप में सामने आ रही हैं। राजधानी के शारदा चौक स्थित जोरापारा इलाके में स्थित भक्त प्रह्लाद धाम में बीते तीन दशकों से एक अनूठी परंपरा निभाई जा रही है, जो निसंतान दंपतियों की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुकी है।

होलिका दहन से जुड़ी अनोखी परंपरा

यहां लकड़ियों के ढेर पर होलिका और भक्त प्रह्लाद की प्रतिमा स्थापित की जाती है। अग्नि प्रज्वलन के समय प्रह्लाद की प्रतिमा को सुरक्षित निकाल लिया जाता है, जबकि होलिका की प्रतिमा का दहन किया जाता है। इसके बाद यही प्रतिमा श्रद्धालु दंपतियों के लिए विशेष आस्था का केंद्र बन जाती है।

1992 से चली आ रही मान्यता

साल 1992 से यहां यह परंपरा शुरू हुई कि होलिका दहन के बाद भक्त प्रह्लाद की प्रतिमा को एक-एक कर निसंतान दंपतियों के घर ले जाया जाता है। मान्यता है कि यदि दंपती इस प्रतिमा को अपने शयनकक्ष में श्रद्धा के साथ रखें, तो उन्हें संतान की प्राप्ति होती है।

इसी विश्वास के चलते प्रतिमा को घर ले जाने के लिए पहले से ही समिति के सदस्यों के पास नंबर लगवाने की व्यवस्था है। इसको लेकर दंपतियों में भारी उत्साह देखा जाता है।

एक माह तक घरों में रहती है प्रतिमा

समिति के अनुसार, होलिका दहन से करीब एक माह पहले तक प्रतिमा स्थानीय घरों में रहती है। इसके बाद रंग-रोगन और साज-सज्जा कर उसे पुनः दहन के लिए तैयार किया जाता है। इस परंपरा में शामिल होने के लिए केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, झारखंड और ओडिशा से भी दंपती यहां पहुंचते हैं।

सैकड़ों परिवारों में संतान का दावा

भक्त प्रह्लाद धाम समिति के संरक्षक विमल गुप्ता और राजेंद्र कोल्हारकर बताते हैं कि वर्ष 1927 में यहां पहली बार होलिका दहन किया गया था, लेकिन उस समय प्रतिमा घर ले जाने की कोई परंपरा नहीं थी।

1992 में जब पहली बार एक दंपती को प्रतिमा दी गई और उनके घर 18 वर्षों बाद संतान हुई, तब से यह सिलसिला लगातार बढ़ता गया। समिति का दावा है कि अब तक 300 से अधिक परिवारों में संतान प्राप्ति हुई है, जिनमें 1999 से 165 मामलों का विधिवत रिकॉर्ड दर्ज है।

आज निभाई जाएगी गोद-भराई की रस्म

सोमवार को प्रह्लाद धाम में निसंतान दंपतियों के लिए ‘गोद-भराई’ की परंपरा निभाई जाएगी। इस अवसर पर राजधानी सहित अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचेंगे।

शाम को समिति की महिलाएं लाल कपड़े में लिपटी प्रह्लाद की तस्वीर, नारियल, सिक्का और चावल भेंट कर दंपतियों को कुछ समय के लिए प्रतिमा गोद में रखने का अवसर देंगी। इसके बाद विधिवत होलिका दहन संपन्न होगा।

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