छत्तीसगढ़ में धान संकट: बारिश से पहले 211 करोड़ का धान उठाव से वंचित, बर्बादी तय!
छत्तीसगढ़ में धान संकट: बारिश से पहले 211 करोड़ का धान उठाव से वंचित, बर्बादी तय!
रायपुर, छत्तीसगढ़। राज्य में मानसून की दस्तक के साथ ही एक बड़ी लापरवाही सामने आ रही है। छत्तीसगढ़ के विभिन्न धान उपार्जन केंद्रों में अब तक 92,303 मीट्रिक टन धान का उठाव नहीं हो पाया है। यह धान करीब 211 करोड़ रुपये मूल्य का है, और लगातार बढ़ रही बारिश के बीच इसके भीगने और खराब होने की आशंका गहराती जा रही है।
समस्या की जड़: उठाव में देरी और बफर स्टॉक लिमिट का उल्लंघन
राज्य सरकार की धान उपार्जन नीति के अनुसार, किसी भी सोसाइटी में बफर स्टॉक लिमिट पार होने के 72 घंटे के भीतर धान का उठाव या परिवहन आवश्यक होता है। बावजूद इसके, सैकड़ों सोसाइटियों में यह नियम अनदेखा किया गया, जिससे अब तक धान का उठाव पूरा नहीं हो सका है।
गौरतलब है कि पिछले साल 14 नवंबर से 31 जनवरी तक राज्य में समर्थन मूल्य पर धान की खरीदी की गई थी। इस दौरान कुल 149 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी हुई, जिसमें से अधिकांश को मिलरों या मार्कफेड के संग्रहण केंद्रों तक भेजा गया। बावजूद इसके, 27 मई 2025 की स्थिति में सरकारी रिकॉर्ड में 92 हजार मीट्रिक टन से अधिक धान अब भी उपार्जन केंद्रों में शेष दर्ज है।
प्रबंधकों पर कार्रवाई की तलवार
गर्मी के मौसम में पहले ही कई सोसाइटियों में धान के सूखने से वजन में कमी आई है, जिससे नुकसान का बोझ सोसायटी प्रबंधकों पर डाला गया है। अब उन पर 2300 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से शेष धान या उसकी समतुल्य राशि जमा कराने का दबाव बनाया जा रहा है। राज्य सरकार की ओर से यह भी चेतावनी दी गई है कि समय पर नुकसान की भरपाई नहीं करने पर एफआईआर दर्ज की जाएगी।
कई प्रबंधकों ने इस कार्रवाई को अनुचित बताते हुए हाईकोर्ट की शरण ली है। उनकी दलील है कि उठाव में देरी और भंडारण की समस्याएं नीति और प्रशासनिक अव्यवस्था की देन हैं, न कि अकेले सोसाइटियों की गलती।
कहां पूरी हुई उठाव प्रक्रिया?
राज्य के 33 जिलों में से सिर्फ पांच जिलों— जांजगीर-चांपा, धमतरी, कोरिया, सरगुजा और सूरजपुर— में ही खरीदे गए पूरे धान का उठाव या परिवहन पूरा हो चुका है। बाकी जिलों में अलग-अलग मात्रा में धान अब भी उपार्जन केंद्रों में पड़ा हुआ है।
निष्कर्ष: समय रहते नहीं चेते, तो बड़ा नुकसान तय
अगर जल्द ही शेष धान का उठाव नहीं हुआ, तो मानसून की बारिश में यह पूरी मात्रा बर्बाद हो सकती है। इससे न केवल सैकड़ों करोड़ का आर्थिक नुकसान होगा, बल्कि इसकी जिम्मेदारी सीधे उन प्रबंधकों पर डाली जाएगी, जिनके पास उठाव अधूरा रह गया है। यह स्थिति राज्य की कृषि नीति और प्रशासनिक तंत्र पर भी सवाल खड़े करती है।
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