Naxal commander Sujata, who was active in Chhattisgarh छत्तीसगढ़-तेलंगाना में सक्रिय 1 करोड़ की इनामी नक्सली कमांडर सुजाता ने किया सरेंडर, माओवादी विचारधारा से टूटा विश्वास
छत्तीसगढ़-तेलंगाना में सक्रिय 1 करोड़ की इनामी नक्सली कमांडर सुजाता ने किया सरेंडर, माओवादी विचारधारा से टूटा विश्वास
तेलंगाना। दक्षिण भारत के जंगलों में कई दशकों तक सक्रिय रही और माओवादी संगठन की सबसे प्रभावशाली महिला कमांडरों में गिनी जाने वाली सुजाता ने हथियार डाल दिए हैं। पुलिस और खुफिया एजेंसियों की पुष्टि के अनुसार, सेंट्रल कमेटी की सदस्य और 1 करोड़ रुपए की इनामी नक्सली कमांडर सुजाता ने तेलंगाना में औपचारिक रूप से सरेंडर कर दिया है।
सुजाता, जो लंबे समय से छत्तीसगढ़ और तेलंगाना की सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय थी, नक्सल संगठन की उन चुनिंदा महिला नेताओं में शामिल थीं, जिन्हें न केवल विचारधारा की गहरी समझ थी बल्कि सैन्य रणनीतियों में भी माहिर माना जाता था। उनके नाम पर दर्जनों बड़ी घटनाओं की जिम्मेदारी बताई जाती रही है, जिनमें सुरक्षा बलों पर हमले और जनता को हिंसा की राह पर ले जाने के प्रयास शामिल हैं।
कई दशक तक रही भूमिगत जिंदगी
सूत्रों के मुताबिक सुजाता लगभग तीन दशक से भूमिगत जीवन बिता रही थी। संगठन में उसकी स्थिति बेहद मजबूत थी। नक्सलियों की सेंट्रल कमेटी वह इकाई है, जहां केवल चुनिंदा और बेहद भरोसेमंद कैडर को जगह मिलती है। सुजाता वहां तक पहुंचने वाली दुर्लभ महिला नेताओं में रही।
तेलंगाना और छत्तीसगढ़ की पुलिस ने उस पर कई आपराधिक मामलों में वारंट जारी किए थे। सरकार ने उस पर कुल 1 करोड़ रुपए का इनाम भी घोषित किया था। इसके बावजूद वह लंबे समय तक पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ से दूर रही।
क्यों टूटा माओवादी विचारधारा से भरोसा?
पुलिस के मुताबिक सुजाता ने पूछताछ के दौरान साफ कहा है कि अब उसे माओवादी संगठन की विचारधारा और गतिविधियों पर विश्वास नहीं रहा। उनका कहना था कि "जिन उद्देश्यों को लेकर यह आंदोलन शुरू किया गया था, वह अब कहीं नजर नहीं आते। संगठन के अंदर महिलाओं के साथ भेदभाव, हिंसा और सत्ता की लड़ाई ने इस आंदोलन को खोखला बना दिया है।"
विशेषज्ञों का मानना है कि नक्सली आंदोलन से धीरे-धीरे लोग मोहभंग का शिकार हो रहे हैं। खासतौर पर वरिष्ठ कैडर, जिन्होंने वर्षों तक जंगलों में रहकर संघर्ष किया है, वे अब यह समझ चुके हैं कि बंदूक की राजनीति न तो समाज बदल सकती है और न ही उनके व्यक्तिगत जीवन को सुरक्षित बना सकती है।
सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी सफलता
तेलंगाना में हुआ सुजाता का आत्मसमर्पण सुरक्षा एजेंसियों के लिए बेहद बड़ी सफलता माना जा रहा है। क्योंकि जिन इलाकों में सुजाता की पकड़ रही है, वहां उसके प्रभाव के चलते नए कैडरों की भर्ती आसान हो जाती थी। सुजाता न केवल रणनीतिकार थी बल्कि नक्सली संगठन में महिलाओं को जोड़ने की अहम जिम्मेदारी भी उसके पास थी।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सुजाता के सरेंडर से नक्सली संगठन को बड़ा झटका लगेगा। इससे न केवल नए युवाओं को गुमराह करने की उनकी कोशिश कमजोर होगी बल्कि कई पुराने कैडरों का भी मनोबल टूटेगा।
आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति का असर
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारों की आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति का असर अब जमीन पर दिखने लगा है। नक्सली हिंसा से प्रभावित राज्यों में सरकार लगातार यह संदेश दे रही है कि जो भी हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में आना चाहता है, उसका स्वागत है।
तेलंगाना पुलिस ने पुष्टि की है कि सुजाता को पुनर्वास योजना का लाभ दिया जाएगा। इसमें वित्तीय सहायता, सुरक्षित आवास और रोजगार की व्यवस्था शामिल होगी।
आंदोलन पर क्या असर?
नक्सली आंदोलन में सुजाता जैसी वरिष्ठ और प्रभावशाली नेता का बाहर निकलना इस बात का संकेत है कि संगठन आंतरिक संकट से गुजर रहा है। एक ओर सुरक्षा बलों का दबाव है, दूसरी ओर नेतृत्व संकट। ऐसे में नए कैडरों की भर्ती और पुराने कैडरों का मनोबल बनाए रखना संगठन के लिए चुनौती बनता जा रहा है।
छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के नक्सल प्रभावित इलाकों में पिछले कुछ वर्षों से माओवादी गतिविधियों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। हालांकि, अभी भी कुछ इलाकों में नक्सलियों का प्रभाव बाकी है। लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह के बड़े सरेंडर से निश्चित रूप से नक्सली संगठन कमजोर होगा।
नतीजा
सुजाता का सरेंडर न केवल पुलिस और सरकार की सफलता है, बल्कि यह उन युवाओं के लिए भी संदेश है जो अब भी हथियार उठाने की राह पर चल रहे हैं। आंदोलन की आड़ में फैली हिंसा और खोखली विचारधारा से मोहभंग का यह बड़ा उदाहरण है। अब सवाल यह है कि क्या आने वाले समय में और भी बड़े नक्सली नेता हथियार डालकर समाज की मुख्यधारा में शामिल होंगे?
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