पेंशन घोटाले में कैलाश लाडवा को न्याय की आस, 5 वर्षों से भटक रहे हैं भूतपूर्व कर्मचारी
पेंशन घोटाले में कैलाश लाडवा को न्याय की आस, 5 वर्षों से भटक रहे हैं भूतपूर्व कर्मचारी
रायपुर/इंदौर। एक सेवानिवृत्त कर्मचारी कैलाश चंद्र लाडवा, जो कि वाणिज्यिक कर विभाग रायपुर में पदस्थ थे, बीते कई वर्षों से अपनी पेंशन और बकाया वेतन के भुगतान के लिए शासन-प्रशासन के चक्कर काट रहे हैं। वे वर्ष 2017 से 2022 तक की अवधि के भुगतान को लेकर संबंधित अधिकारियों से लगातार पत्राचार और गुहार लगा रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें न्याय नहीं मिला है।
5 वर्षों का भुगतान रुका, अधिकारी बता रहे एक-दूसरे को जिम्मेदार
कैलाश लाडवा का आरोप है कि उन्होंने 4 अक्टूबर 2017 से 16 मई 2022 तक की सेवा दी, लेकिन इस अवधि का वेतन और पेंशन भुगतान अब तक नहीं किया गया है। मामले में कई पत्र व प्रकरण क्रमांक (जैसे: RTI.118/CMS/2023, ESTD/1286/2025, HPC/2025 आदि) प्रस्तुत किए गए, लेकिन संबंधित अधिकारी केवल फाइल आगे बढ़ाने की बात कहकर मामले को टालते रहे।
मुख्यमंत्री सचिवालय से भी जारी हुए निर्देश, फिर भी कार्रवाई नहीं
दिनांक 3 अप्रैल 2025 को मुख्यमंत्री सचिवालय की ओर से वाणिज्यिक कर विभाग को आवश्यक कार्रवाई हेतु पत्र जारी किया गया। लेकिन, वाणिज्यिक कर विभाग द्वारा अभी तक कोई स्पष्ट निर्देश या भुगतान नहीं किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि शासन के आदेशों को भी नजरअंदाज किया जा रहा है।
मानसिक प्रताड़ना और भ्रष्टाचार का आरोप
कैलाश लाडवा का कहना है कि उन्हें बिना किसी कारण के बार-बार अलग-अलग जांचों और संज्ञानों में उलझाया गया है। वे लिखते हैं कि उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है, और यह सब कुछ अधिकारियों की मिलीभगत और भ्रष्टाचार का परिणाम है।
PM Award विजेता कर्मचारी को किया जा रहा नजरअंदाज
कैलाश लाडवा स्वयं को एक ईमानदार और सेवा-निष्ठ कर्मचारी बताते हैं जिन्हें पूर्व में प्रधानमंत्री पुरस्कार (PM Award) से सम्मानित किया जा चुका है। ऐसे कर्मठ कर्मचारी के साथ इस प्रकार का व्यवहार शासन-प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है।
आखिरी उम्मीद न्यायपालिका से
वर्तमान में लाडवा जी ने न्यायालय की शरण ली है और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका कहना है कि यदि शीघ्र भुगतान नहीं हुआ तो वे आमरण अनशन जैसे कदम उठाने को मजबूर होंगे।
मायने
यह मामला केवल एक कर्मचारी के बकाया भुगतान का नहीं है, बल्कि यह पूरी व्यवस्था की लापरवाही और संवेदनहीनता का उदाहरण है। यदि ऐसे कर्मियों को न्याय नहीं मिला, तो यह बाकी कर्मचारियों के मनोबल पर भी असर डालेगा।
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