अंबेडकर अस्पताल में अमानवीय वसूली: शव के कफन के लिए मांगे जा रहे 500 रुपये, मना करने पर मिलती धमकी

Inhuman extortion in Ambedkar Hospital: 500 rupees are being demanded for the shroud of the dead body, threats are given on refusal अंबेडकर अस्पताल में अमानवीय वसूली: शव के कफन के लिए मांगे जा रहे 500 रुपये, मना करने पर मिलती धमकी
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अंबेडकर अस्पताल में अमानवीय वसूली: शव के कफन के लिए मांगे जा रहे 500 रुपये, मना करने पर मिलती धमकी

अंबेडकर अस्पताल में अमानवीय वसूली: शव के कफन के लिए मांगे जा रहे 500 रुपये, मना करने पर मिलती धमकी

रायपुर, 8 जून 2025 – छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल डॉ. भीमराव अंबेडकर अस्पताल से इंसानियत को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। जहां एक ओर परिजन शोक और सदमे में अपने प्रियजनों के शव लेने आते हैं, वहीं अस्पताल परिसर में कुछ कर्मचारी और एंबुलेंस ड्राइवर कफन देने के बदले 500 रुपये की जबरन वसूली कर रहे हैं। मना करने पर परिजनों को शव बिना कफन के ले जाने की धमकी दी जाती है।

कांकेर के आदिवासी परिवार के साथ अमानवीय व्यवहार

हाल ही में कांकेर जिले से आए एक आदिवासी परिवार को यह कहकर झटका दिया गया – “पैसे नहीं हैं? तो शव बिना कफन के ले जाओ।” यह कोई एक घटना नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा प्रतीत होता है, जो हर grieving परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहा है।

मुक्तांजलि योजना बनी मज़ाक

राज्य सरकार द्वारा अंतिम संस्कार के लिए "मुक्तांजलि योजना" के अंतर्गत करीब 40 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया है। योजना का उद्देश्य था कि गरीब, असहाय और दूर-दराज से आए लोगों को सम्मानजनक अंतिम विदाई में सहायता मिले। लेकिन इसकी जगह अस्पताल परिसर में कुछ भ्रष्ट कर्मचारी इसी योजना का नाम लेकर वसूली कर रहे हैं, जबकि पीड़ित परिजन अपनों का शव पाने के लिए चुपचाप रिश्वत देने को मजबूर हैं।

शवगृह में चलता 'कमीशन रैकेट'

सूत्रों के मुताबिक यह वसूली अस्पताल के पोस्टमार्टम विभाग और शवगृह से संबंधित कुछ कर्मचारियों और निजी एंबुलेंस ऑपरेटरों की मिलीभगत से हो रही है। शव के पोस्टमार्टम के बाद, शव को कफन में लपेटने के लिए ‘कमिशन’ के नाम पर पैसे वसूले जा रहे हैं। अस्पताल प्रबंधन की ओर से कोई ठोस निगरानी नहीं होने के कारण यह रैकेट खुलेआम फल-फूल रहा है।

शासन को घेरते सवाल

जब सरकार ने अंतिम संस्कार सहायता के लिए करोड़ों का बजट तय किया है, तो पीड़ितों से वसूली क्यों?

क्या गरीब और आदिवासी परिवारों को उनके अपनों की लाश तक सम्मानपूर्वक नहीं मिल सकती?

अस्पताल प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठते हैं – क्या वे इस रैकेट से अनजान हैं या मौन समर्थन कर रहे हैं?

यह सिर्फ लापरवाही नहीं, यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।

यह वो शासन व्यवस्था है, जो मृत शरीर को भी कमाई का जरिया बना देती है।

सरकार और स्वास्थ्य विभाग को इस मामले की जांच कर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए और ऐसे अमानवीय कर्मचारियों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाना चाहिए।

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