बिलासपुर की सरकारी कोल माइंस के 25 किमी के भीतर अवैध कोल डिपो संचालित हो रहे हैं। जानिए किस तरह प्रशासनिक संरक्षण में फलफूल रहा है कोयला माफिया।

Illegal coal depots are operating within 25 बिलासपुर की सरकारी कोल माइंस के 25 किमी के भीतर अवैध कोल डिपो संचालित हो रहे हैं। जानिए किस तरह प्रशासनिक संरक्षण में फलफूल रहा है कोयला माफिया।
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बिलासपुर की सरकारी कोल माइंस के 25 किमी के भीतर अवैध कोल डिपो संचालित हो रहे हैं। जानिए किस तरह प्रशासनिक संरक्षण में फलफूल रहा है कोयला माफिया।

सरकारी कोल खदान के 25 किमी के दायरे में अवैध कोल डिपो का जाल, पहली बार सर्वे की तैयारी

बिलासपुर।सरकारी कोयला खदानों के इर्द-गिर्द अवैध कारोबार का एक बड़ा नेटवर्क धीरे-धीरे सामने आ रहा है। जमुनापाली कोल माइंस के आसपास पिछले कई वर्षों से दर्जनों वैध और अवैध कोल डिपो संचालित हो रहे हैं, जो माइनिंग नियमों का खुला उल्लंघन है। अब पहली बार इन डिपो का सर्वे कर रिपोर्ट तलब की गई है, जिससे संबंधित अधिकारियों में हलचल मच गई है।

क्या कहता है नियम?

कोल माइंस रेग्युलेशन्स 2017 के अनुसार, किसी भी सरकारी कोयला खदान से 25 किलोमीटर के दायरे में कोई कोल डिपो, कोल क्रशर प्लांट या वॉशरी संचालित नहीं की जा सकती। नियमों के उल्लंघन पर:

₹1 लाख प्रतिदिन का जुर्माना

लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई

डिपो को तत्काल सील करने की सिफारिश की जा सकती है

नियमों की धज्जियां उड़ाते दर्जनों डिपो

जमुनापाली से संदरी तक के क्षेत्र में दर्जनों कोल डिपो खुलेआम काम कर रहे हैं। इनमें से कई डिपो पूरी तरह अवैध हैं। सूत्रों के अनुसार, ये डिपो नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों के संरक्षण में पनप रहे हैं, जिससे प्रशासन भी इन्हें बंद कराने में रुचि नहीं दिखाता।

कोयले की चोरी और करोड़ों का खेल

धंधे से जुड़े लोगों का कहना है कि सरकारी खदान से कोयला चोरी करना बेहद आसान है, इसलिए खदान के आसपास ही डिपो खोले जा रहे हैं। यह भी आरोप है कि कई डिपो प्रशासन और पुलिस की मिलीभगत से संचालित हो रहे हैं। यही कारण है कि यह अवैध कारोबार करोड़ों का बन चुका है और इसमें जुड़े लोग लक्ज़री गाड़ियों में घूमते और रईसी जीवन जीते नजर आते हैं।

लेवी वसुली का खेल पहले जैसा ही जारी

जिस कोयले को लेकर पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान विवाद हुआ था, और जिनमें अधिकारियों तक की गिरफ्तारी हुई, आज भी वैसी ही स्थिति बनी हुई है।

पहले व्यापारी सूर्यकांत तिवारी, सौम्या चौरसिया और अनिल टुटेजा को लेवी देते थे।

आज भी उसी कोयले की कीमत किसी और के माध्यम से वसूली जा रही है।

सत्ता बदली लेकिन कोयला माफिया का नेटवर्क बरकरार है।

जांच टीम की कार्रवाई खानापूर्ति भर

हालांकि माइनिंग विभाग और पुलिस की टीमें समय-समय पर छापेमारी करती हैं, लेकिन वह महज औपचारिकता बनकर रह जाती हैं। अब जब मंत्रालय ने रिपोर्ट मांगी है, तो उम्मीद की जा रही है कि सख्त कार्रवाई की शुरुआत हो सकती है।

सरकारी नियमों को दरकिनार कर खदानों के पास कोल डिपो चला रहे माफिया प्रशासनिक संरक्षण के चलते निर्भीक हैं। अगर मंत्रालय स्तर पर सख्त रुख अपनाया गया, तो दर्जनों कोल डिपो पर ताले लग सकते हैं और कोयला चोरी का यह खेल बंद हो सकता है।

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