भिलाई की नन गिरफ्तारी पर कांग्रेस का "ईसाई प्रेम" उजागर, हिंदुओं के मुद्दों पर चुप्पी क्यों?
भिलाई की नन गिरफ्तारी पर कांग्रेस का "ईसाई प्रेम" उजागर, हिंदुओं के मुद्दों पर चुप्पी क्यों?
रायपुर/दुर्ग। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में दो कैथोलिक ननों की गिरफ्तारी ने एक बार फिर कांग्रेस पार्टी की "हिंदू विरोधी" छवि को उजागर कर दिया है। बस्तर के अबूझमाड़ क्षेत्र की दो आदिवासी लड़कियों को कथित रूप से नौकरी देने के बहाने धर्मांतरण के प्रयास का मामला सामने आया, जिसमें छत्तीसगढ़ पुलिस ने कार्रवाई करते हुए दोनों ननों को गिरफ्तार किया।
इस गिरफ्तारी के बाद पूरे प्रदेश में बजरंग दल और हिंदू संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया और प्रशासन से सख्त कदम उठाने की मांग की। पुलिस ने कार्यवाही की भी, लेकिन इसके बाद कांग्रेस पार्टी मानो बौखला गई। राहुल गांधी से लेकर कांग्रेस के कई शीर्ष नेता इन ननों के समर्थन में सामने आ गए और इसे "न्याय का हनन" बताने लगे।
कांग्रेस की चुप्पी हिंदू मुद्दों पर क्यों?
देशभर में जब-जब हिंदू समाज के साथ अन्याय हुआ, चाहे वो कश्मीरी हिंदुओं का पलायन हो, बंगाल में हिंदुओं पर हमले हो, या फिर कन्याकुमारी से कश्मीर तक मंदिरों पर हमले—कांग्रेस पार्टी का रवैया हमेशा चुप्पी वाला रहा है। राहुल गांधी जैसे नेता न तो कभी ट्वीट कर शोक जताते हैं और न ही घटनाओं की निंदा करते हैं। लेकिन जैसे ही ईसाई या मुस्लिम समुदाय से जुड़ा मामला सामने आता है, पूरी कांग्रेस पार्टी संवेदनशील हो जाती है।
क्या कांग्रेस वास्तव में हिंदू विरोधी है?
इस घटना के बाद एक बार फिर जनता के मन में यह सवाल गहराने लगा है कि क्या कांग्रेस वास्तव में हिंदू विरोधी पार्टी है? कांग्रेस के चार सांसद—बेनी बहन फ्रांसिस, जॉर्ज एन के प्रेमचंद, अनिल ए थॉमस और सप्तगिरि उल्का जेल जाकर ननों से मिलने पहुंचे और उनका समर्थन किया। इस "संवेदनशीलता" का प्रदर्शन क्या केवल ईसाई समुदाय के लिए है?
राहुल गांधी की इस प्रतिक्रिया से सनातनी समाज में आक्रोश है। सवाल यह है कि जब पूरे देश में मंदिरों पर हमले होते हैं, धर्मांतरण की घटनाएं सामने आती हैं, तब कांग्रेस क्यों चुप रहती है? क्यों कोई गांधी परिवार का सदस्य ट्वीट कर पीड़ित हिंदुओं के साथ सहानुभूति नहीं जताता?
क्या कांग्रेस को केवल वोट बैंक की चिंता है?
भारतीय जनता पार्टी और तमाम हिंदू संगठनों का लंबे समय से आरोप रहा है कि कांग्रेस पार्टी केवल मुसलमानों और ईसाइयों के तुष्टिकरण की राजनीति करती है। बहुसंख्यक हिंदू समाज को केवल वोट बैंक के रूप में देखा जाता है। यह घटना उसी आरोप को एक बार फिर पुष्ट करती है।
हिंदू नेताओं को भी सोचने का समय है
कांग्रेस में कई बड़े हिंदू नेता हैं, लेकिन क्या उन्हें अब आत्मचिंतन नहीं करना चाहिए? जब पार्टी की नीतियां स्पष्ट रूप से बहुसंख्यक समाज के हितों के विपरीत जा रही हों, तब क्या चुप रहना उचित है? कांग्रेस का यह रवैया आने वाली पीढ़ियों के लिए भी घातक हो सकता है, जब देश की जनसंख्या संरचना में बदलाव की आहट सुनाई देने लगे।
बीजेपी का पक्ष क्यों मजबूत हो रहा है?
जब कांग्रेस पार्टी अल्पसंख्यकों के पक्ष में झुकती है, तब बीजेपी खुले तौर पर मठ-मंदिरों, तीर्थस्थलों, हिंदू परंपराओं और संस्कृति को संरक्षण देने की दिशा में काम करती है। यही कारण है कि आज देश के अधिकांश सनातनी और हिंदू मतदाता बीजेपी के साथ खड़े नजर आते हैं। कांग्रेस की यह नीति उसे लगातार राजनीतिक हाशिए पर धकेल रही है।
मायने
भिलाई की घटना सिर्फ दो ननों की गिरफ्तारी की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक मानसिकता का आईना है, जो बहुसंख्यक हिंदू समाज की उपेक्षा कर अल्पसंख्यकों के हित में खड़ी दिखाई देती है। अब वक्त आ गया है कि देश का हिंदू समाज सच को पहचाने और यह तय करे कि उसका हित किसके साथ सुरक्षित है—भारतीय संस्कृति को सम्मान देने वाले नेतृत्व के साथ या हिंदू विरोधी मानसिकता को पोषित करने वाले सत्ता के लालचियों के साथ।
(यह रिपोर्ट एक सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण पर आधारित है, और इसका उद्देश्य किसी धर्म विशेष के प्रति नफरत फैलाना नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर जागरूकता लाना है।)
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