1000 करोड़ भ्रष्टाचार मामले में चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी, एसीबी-EOW की चुप्पी पर उठे सवाल
1000 करोड़ भ्रष्टाचार मामले में चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी, एसीबी-EOW की चुप्पी पर उठे सवाल
ED की कार्यवाही के बाद अब एसीबी और EOW पर निगाहें, क्या भूपेश बघेल के परिवार तक पहुंचेगी जांच?
रायपुर, 31 जुलाई 2025 — प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 1000 करोड़ रुपये के कथित भ्रष्टाचार मामले में चैतन्य उर्फ बिट्टू बघेल को गिरफ्तार किया है। इस कार्रवाई से राज्य की राजनीति में हलचल मच गई है और अब एसीबी (भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो) और EOW (आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा) की निष्क्रियता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, ED की कार्रवाई पुलिस द्वारा दर्ज शेड्यूल ऑफ़ेन्स से संबंधित FIR के आधार पर शुरू हुई। प्रवर्तन निदेशालय द्वारा रिमांड नोट में यह उल्लेख किया गया है कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के करीबी बिट्टू बघेल की कंपनियों में सीधे तौर पर 16.7 करोड़ रुपये की भ्रष्टाचार की राशि भेजी गई है। इतना ही नहीं, लगभग 1000 करोड़ की रकम को अलग-अलग स्थानों पर भेजे जाने में बिट्टू बघेल की महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है।
राज्य एजेंसियों की चुप्पी पर सवाल
जहां एक ओर ED ने ठोस सबूतों के आधार पर गिरफ्तारी की है, वहीं यह हैरानी की बात है कि राज्य की एसीबी और EOW के पास भी यही साक्ष्य होने के बावजूद अब तक बिट्टू बघेल के खिलाफ कोई समन तक जारी नहीं किया गया है। इस निष्क्रियता से न केवल राजनीतिक हलकों में बल्कि भाजपा खेमे में भी असंतोष व्याप्त है।
बीजेपी के कई पदाधिकारी अब अपनी ही सरकार से यह सवाल पूछने को मजबूर हैं कि भूपेश बघेल और उनके परिवार के खिलाफ एसीबी व EOW आखिर कब कार्रवाई करेंगे?
मोदी सरकार की "भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस" नीति की अगली परीक्षा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चुनावी रैलियों में बार-बार यह वादा किया गया था कि "भ्रष्टाचारियों को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वह कोई भी हो, यहां तक कि मुख्यमंत्री भी नहीं।" अब यह देखना होगा कि इस नीति का क्रियान्वयन छत्तीसगढ़ में कब और कैसे होता है।
राजनीतिक दबाव या कानूनी बाधा?
जानकारों का मानना है कि ED की कार्रवाई के बाद एसीबी और EOW की भूमिका को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि इनके पास पर्याप्त प्रमाण पहले से थे, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या कोई राजनीतिक दबाव इस चुप्पी का कारण है, या फिर कानूनी प्रक्रिया में कोई अड़चन?
अब सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या राज्य की जांच एजेंसियाँ स्वतंत्र और निष्पक्ष कार्रवाई करेंगी, या फिर यह मामला भी राजनैतिक बहसों में ही गुम हो जाएगा।
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