CG MSC projects worth crores loom large CG एमएससी में करोड़ों के प्रोजेक्ट पर संकट के बादल,स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल,भ्रष्टाचार और भूमिका पर सवाल
CG एमएससी में करोड़ों के प्रोजेक्ट पर संकट के बादल,स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल,भ्रष्टाचार और भूमिका पर सवाल
रायपुर। छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विस कॉर्पोरेशन (सीजीएमएससी) की ओर से हाल ही में कई करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट्स और 100 बेड के अस्पताल निर्माण के लिए निविदा (टेंडर) जारी किए गए हैं। सरकार की ओर से इस पहल को स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के प्रयास के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन, जानकारों का कहना है कि तकनीकी टीम और विशेषज्ञ स्टाफ की कमी के कारण ये प्रोजेक्ट सफल होने के बजाय भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ सकते हैं।
मेडिकल कॉलेजों का पिछला अनुभव बना उदाहरण
राज्य में अब तक जितने भी मेडिकल कॉलेज बनाए गए हैं, उनमें ठेकेदारों ने बिलो (BILLO) प्रक्रिया के माध्यम से टेंडर हासिल किए थे। उस समय भी निर्माण कार्य में कई तरह की खामियां देखने को मिलीं। ठेकेदारों को भुगतान में देरी के कारण वे परेशान रहे और समय पर गुणवत्तापूर्ण कार्य नहीं कर पाए। आज भी वही स्थिति दोहराए जाने की आशंका जताई जा रही है।
एक ही ठेकेदार के पास कई प्रोजेक्ट
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, सीजीएमएससी ने एक ही ठेकेदार को चार-चार बड़े काम सौंप दिए हैं। बताया जा रहा है कि यह ठेकेदार कथित रूप से एक बड़े नेता के पुत्र और उनके रिश्तेदारों से जुड़ा हुआ है। चर्चा में आ रहे नाम "डीबी प्रोजेक्ट" का है, जो वर्तमान में छत्तीसगढ़ विधानसभा भवन का निर्माण भी कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि एक ही ठेकेदार को लगातार बड़े प्रोजेक्ट सौंपने से पारदर्शिता और गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
तकनीकी टीम की भारी कमी
सीजीएमएससी के पास खुद की तकनीकी टीम का न होना सबसे बड़ी समस्या है। जानकारों के मुताबिक, बिना इंजीनियरिंग और तकनीकी स्टाफ के इतनी बड़ी परियोजनाओं की निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण संभव नहीं है। इस स्थिति का फायदा ठेकेदार उठा रहे हैं और मनमानी कार्यशैली अपनाकर करोड़ों रुपए के प्रोजेक्ट्स को अधर में डाल रहे हैं।
वहीं प्रदेश के युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी इन परियोजनाओं में नगण्य हैं। निर्माण कार्य का अधिकांश हिस्सा बाहरी ठेकेदारों और उनके नेटवर्क के हाथों में है।
स्वास्थ्य मंत्री पर उठ रहे सवाल
सूत्रों का कहना है कि इन प्रोजेक्ट्स को लेकर स्वास्थ्य मंत्री श्याम जायसवाल पर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि निविदाओं की जल्दबाजी और बिना तकनीकी तैयारी के करोड़ों रुपए के प्रोजेक्ट्स मंजूर किए जा रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि यह सब एक “साजिश” के तहत हो रहा है, ताकि बड़े पैमाने पर पैसों का बंदरबांट किया जा सके।
पीडब्ल्यूडी के पास अनुभव, लेकिन काम से दूर
विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य के लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के पास पूरी तकनीकी टीम और वर्षों का अनुभव है। पीडब्ल्यूडी ने अब तक सड़क, पुल, भवन और अस्पताल जैसी बड़ी परियोजनाओं को सफलतापूर्वक पूरा किया है। इसके बावजूद सीजीएमएससी द्वारा पीडब्ल्यूडी को दरकिनार कर ठेकेदारों के भरोसे प्रोजेक्ट्स देना कई सवाल खड़े करता है।
वर्तमान में पीडब्ल्यूडी केवल मेंटेनेंस कार्य तक सीमित रह गया है, जबकि सीजीएमएससी लगातार करोड़ों की निविदाएं निकाल रहा है।
भ्रष्टाचार का अड्डा बना सीजीएमएससी?
सीजीएमएससी बोर्ड का गठन एम.के. रावत के कार्यकाल में किया गया था। उस समय से ही इस विभाग को लेकर विवाद और आरोप-प्रत्यारोप होते रहे हैं। जानकारों का कहना है कि इस विभाग को जानबूझकर एक "भ्रष्टाचार की फैक्ट्री" के रूप में इस्तेमाल किया गया है, जहां पारदर्शिता और गुणवत्ता से ज्यादा ठेकेदारों और नेताओं के हितों को प्राथमिकता दी जाती है।
नतीजा: जनता का पैसा, लेकिन जनता का लाभ नहीं
इन सब परिस्थितियों से साफ है कि करोड़ों रुपए की योजनाओं का वास्तविक लाभ जनता तक पहुंचने में संदेह है। अस्पताल और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में यदि भ्रष्टाचार और लापरवाही हावी रही तो जनता के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर होने के बजाय और भी बदहाल हो सकती हैं।
राज्य के स्वास्थ्य तंत्र को मजबूती देने के बजाय यदि ठेकेदारों और नेताओं के हित साधे जाएंगे, तो आने वाले समय में यह प्रोजेक्ट प्रदेश की जनता के लिए बोझ साबित हो सकते हैं।
यह रिपोर्ट बताती है कि सीजीएमएससी की कार्यशैली और प्रोजेक्ट्स की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। फिलहाल जनता की नजर इस बात पर है कि क्या सरकार इन आरोपों की जांच कर पारदर्शिता सुनिश्चित करेगी या फिर करोड़ों की योजनाएं एक और भ्रष्टाचार के अध्याय में तब्दील हो जाएंगी।
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