छत्तीसगढ़ में 3200 करोड़ के शराब घोटाले पर उठे बड़े सवाल"अमिताभ जैन"मुख्य सचिव या ‘शराब सचिव’?
मुख्य सचिव या ‘शराब सचिव’? छत्तीसगढ़ की व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल
रायपुर। छत्तीसगढ़ की नौकरशाही इन दिनों सबसे ज़्यादा सवालों के घेरे में है। प्रदेश के मुख्य सचिव अमिताभ जैन को मिला कार्यकाल विस्तार सरकार प्रशासनिक मजबूरी बता रही है, मगर हकीकत कहीं ज़्यादा उलझी हुई और गंभीर नज़र आती है। राज्य की शराब व्यवस्था और उससे जुड़े घोटाले इस विस्तार को लेकर संदेह खड़ा कर रहे हैं।
शराब कंपनी का चेयरमैन खुद मुख्य सचिव
छत्तीसगढ़ स्टेट मार्केटिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड (CSMCL) राज्य में शराब बिक्री का पूरा तंत्र संचालित करता है। इस कॉर्पोरेशन का चेयरमैन सीधे तौर पर मुख्य सचिव ही होता है।
यानी – शराब नीति बनाना, लागू करना, ठेकों पर निगरानी रखना और हजारों करोड़ के राजस्व की सुरक्षा करना, सब मुख्य सचिव की जिम्मेदारी में आता है।
कागज़ों में यह व्यवस्था पारदर्शिता का दावा करती है, मगर ज़मीनी हकीकत घोटालों और अव्यवस्था की कहानी कहती है।
शराब घोटाले का साया
अमिताभ जैन के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ ने अब तक का सबसे बड़ा शराब घोटाला देखा।
ईडी की जांच रिपोर्ट में सामने आया कि
नकली बारकोड के ज़रिए करोड़ों का खेल हुआ।
कमीशन और बैकडेटेड बिलिंग का सिंडिकेट खड़ा किया गया।
ब्लैक में शराब बिक्री का सिलसिला वर्षों तक चला।
बड़ा सवाल यह है कि जब सिस्टम का मुखिया खुद CSMCL का चेयरमैन था, तो क्या वह इस सब से अनजान थे? या फिर यह सब उनकी मौन स्वीकृति से ही संभव हुआ?
विदेश दौरा और प्रशासनिक शून्यता
हाल ही में मुख्य सचिव विदेश दौरे पर थे। चौंकाने वाली बात यह रही कि उनके न रहने पर किसी अधिकारी को चार्ज तक नहीं सौंपा गया।
इस दौरान प्रदेश का प्रशासन बिना औपचारिक मुखिया के चलता रहा। सवाल यह है कि अगर कोई आपात स्थिति आ जाती तो राज्य की कमान किसके हाथ में होती?
क्या यह व्यवस्था की गंभीर लापरवाही नहीं है?
एक्सटेंशन: मजबूरी या राजनीतिक ‘इनाम’?
सरकार ने कार्यकाल विस्तार को प्रशासनिक स्थिरता का नाम दिया है। लेकिन राजनीतिक हलकों में चर्चा यही है कि यह विस्तार शराब व्यवस्था और उससे जुड़े समीकरणों की वजह से मिला।
शराब से राज्य को हर साल हजारों करोड़ का राजस्व मिलता है।
यही राजस्व राजनीतिक गतिविधियों और चुनावी समीकरणों को साधने का जरिया भी बनता है।
मंत्री से लेकर सीएम के बेटे तक पर कार्रवाई हुई, मगर चेयरमैन यानी मुख्य सचिव पर आंच तक नहीं आई।
उल्टा उन्हें विस्तार का “इनाम” मिल गया।
अब हाईकोर्ट की चौखट पर मामला
इस पूरे मामले को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दाखिल करने की तैयारी हो रही है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है –
> “जब मंत्री और सीएम के बेटे पर कार्रवाई संभव है तो सिस्टम का मुखिया कैसे अछूता रह सकता है?”
यानी यह पूरा खेल मुख्य सचिव के संज्ञान में ही हुआ और उनकी मौन स्वीकृति के बिना संभव नहीं था।
राजनीतिक पहलू
राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। विपक्ष इसे “एक्सटेंशन नहीं, बल्कि घोटाले का प्रोटेक्शन” बता रहा है।
कांग्रेस के भीतर भी यह सवाल उठ रहा है कि जिस पद से पारदर्शिता और जवाबदेही की उम्मीद थी, वही पद अब सबसे अपारदर्शी व्यवस्था का प्रतीक क्यों बन गया है?
वहीं सत्ता पक्ष चुप्पी साधे हुए है। कारण साफ है – शराब नीति से सरकार को होने वाला भारी-भरकम राजस्व, जो चुनावी सालों में राजनीति की ऑक्सीजन बनता है।
व्यवस्था पर तंज
छत्तीसगढ़ की स्थिति पर यही कहा जा सकता है –
जनता महंगी शराब खरीदती है।
घोटालों से तिजोरी भरती है।
और प्रशासन का मुखिया चेयरमैन बनकर भी आँखें मूँद लेता है।
मुख्य सचिव का पद किसी भी राज्य का सबसे ऊँचा प्रशासनिक पद होता है। लेकिन छत्तीसगढ़ में यह पद अब प्रशासनिक जिम्मेदारी से ज़्यादा शराब व्यवस्था की कुंजी बनकर रह गया है। यही हकीकत इस एक्सटेंशन की असली वजह उजागर करती है।
मायने
यह कार्यकाल विस्तार सिस्टम चलाने के लिए नहीं, बल्कि शराब व्यवस्था को बचाए रखने और राजनीतिक समीकरण साधने के लिए दिया गया है। सवाल यह है कि क्या छत्तीसगढ़ की नौकरशाही सच में “प्रशासन” चला रही है या “शराब साम्राज्य”?
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