छत्तीसगढ़ में नक्सली मौत के डर से युद्ध विराम और शांति वार्ता के लिए सरकार सामने गिड़गिड़ा रहे हैं..।

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छत्तीसगढ़ में नक्सली मौत के डर से युद्ध विराम और शांति वार्ता के लिए सरकार सामने गिड़गिड़ा रहे हैं..।

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकामा जैसे घने जंगलों में लंबे समय से एक गंभीर समस्या बनी हुई है। सरकार और सुरक्षा बलों द्वारा कई वर्षों से चलाए जा रहे अभियानों के बावजूद, यह समस्या पूरी तरह से समाप्त नहीं हो पाई थी। लेकिन अब ऐसा अनोखा हो रहा है कि कोल्ड स्टोरेज अभियान "ऑपरेशन लेटर" इस ​​दिशा में ढलान ला रहा है।

ऑपरेशन तूफान - तूफान झटका

'कागर' नाम से चलाया जा रहा है इस विशेष ऑपरेशन में उनके आखिरी गढ़ों को भी घेरना शुरू कर दिया गया है। लगातार जंगल में चल रही मशीनरी और साक्षियों की कार्रवाई में बोल्टों के बीच असंतोष फैलाया गया है। न केवल आजीविका की कमी, बल्कि खाद्य-सामग्री और चिकित्सा सहायता की कमी भी अब उनकी स्थिति को बेहद कम कर रही है।

पिछले एक महीने में माइक्रोसॉफ्ट को कई बड़ी सफलताएं मिली हैं। कई मॅचैलियेंट्स भी मारे गए हैं। दस्तावेज़ के अनुसार, कुछ बड़े सैन्य कमांडर या तो घायल हैं या जंगल में छिपे हुए हैं। ऐसे में यूक्रेन में संगठन के शीर्ष नेतृत्व द्वारा शांति की अपील किसी बड़े बदलाव की ओर संकेत करती है।

प्रेस नोट - 'अभय' की वर्णमाला या स्थापत्य?

1 अप्रैल को एक प्रेस नोट सामने आया, जिसे प्रतिष्ठित नेता 'अभय' ने जारी किया है। इस पत्र में सरकार से संवाद और शांति की अपील की गई है। अभय ने लिखा है कि संघर्ष से आम जनता को नुकसान हो रहा है और अब समय आ गया है कि दोनों पक्ष मिलकर समाधान तलाशें।

इस अपील ने राजनीतिक गलियारों और सुरक्षा शोलों में हलचल मचा दी है। जहां एक ओर कुछ विशेषज्ञ इसे सकारात्मक संकेत मान रहे हैं, वहीं कुछ इसे ऑर्केस्ट्रा की प्रमुख चाल मान रहे हैं - ताकि वे खुद को पुनर्गठित कर सकें या समय ले सकें।

क्या ऋणी दिवालिया हो चुके हैं?

सुरक्षा बुनियादी ढांचे का मानना ​​है कि ऑपरेशन ने क्वालकॉम के लॉजिक वैज्ञानिक को बुरी तरह प्रभावित किया है। जंगल में उनकी छिपकली की जगहें अब पहले की तरह सुरक्षित नहीं रहीं। डूबे, सैटेलाइट सैटेलाइट और लोकेल साकी के साएडे अब सिक्योरिटी फोर्स उन्हें सेकेल्ड करने में सफल हो रहे हैं।

स्थानीय स्तर पर भी तारामंडल का भय अब पहले जैसा नहीं रहा। सरकारी परतें अब जोखिम समूह तक पहुंच रही हैं, जबकि अन्य समुदायों को विकल्प मिल रहे हैं।

सरकार की रणनीति कैसी होनी चाहिए?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार इस प्रेस नोट पर क्या प्रतिक्रिया दे? क्या सरकार को बातचीत की पहल करनी चाहिए या इसे पूरी तरह से खत्म करने की कोशिश करनी चाहिए?

राज्य सरकार के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों का मानना ​​है कि अगर वास्तव में शांति की इच्छा है, तो सरकार को कुछ हद तक बातचीत के लिए मंच तैयार करना चाहिए। वहीं कुछ सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह धोखा भी हो सकता है, क्योंकि प्रायश्चित्त वैल्यूएशन ब्रेक लेकर से फिर से संबंध हो जाते हैं।

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