नवा रायपुर स्टेडियम के मुख्य द्वार का मस्जिदनुमा आकार और हरा रंग बना विवाद की वजह ..।
नया रायपुर अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम के मुख्य द्वार की बनावट पर विवाद, मस्जिदनुमा गुंबद और ग्रीन कलर को लेकर उठे सवाल
रायपुर। छत्तीसगढ़ की नई राजधानी नवा रायपुर स्थित अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम एक बार फिर विवादों के घेरे में है। इस बार स्टेडियम के मुख्य द्वार की बनावट और रंग को लेकर समाज के एक वर्ग ने नाराजगी जाहिर की है। आरोप लगाया जा रहा है कि स्टेडियम के प्रवेश द्वार को मस्जिदनुमा गुंबद की शक्ल दी गई है और उसे हरे रंग से रंगकर सनातन संस्कृति के अनुयायियों की भावनाओं को आहत किया गया है।
इस मुद्दे पर सोशल मीडिया से लेकर सियासी गलियारों तक हलचल मची है। कई संगठन और स्थानीय लोग इस द्वार को तोड़ने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि खेल के मैदान को धार्मिक प्रतीकों का अखाड़ा न बनाया जाए। जानकार भी मानते हैं कि स्टेडियम जैसी अंतरराष्ट्रीय सुविधा का स्वरूप धर्मनिरपेक्ष और सर्वसमावेशी होना चाहिए, जिससे सभी वर्ग के लोग बिना किसी असहजता के वहां आ-जा सकें।
भ्रष्टाचार और साजिश के आरोप
इस मामले में पूर्ववर्ती भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल में वन मंत्री रहे मोहम्मद अकबर के भाई मोहम्मद अजगर का नाम भी चर्चा में है। बताया जा रहा है कि मेसर्स रायपुर कंस्ट्रक्शन कंपनी प्राइवेट लिमिटेड, जो मोहम्मद अजगर की बताई जा रही है, ने नई राजधानी में हजारों करोड़ के ठेके लिए थे।
इसी दौरान स्टेडियम के मुख्य द्वार की डिजाइन और रंग योजना में बदलाव कर इसे मस्जिदनुमा आकार दे दिया गया और हरे रंग से पाट दिया गया। आरोप है कि यह एक सुनियोजित साजिश के तहत किया गया ताकि सनातनी समुदाय की भावनाओं को चोट पहुंचे।
साथ ही झांझ जलाशय पाथवे को पाटकर कंक्रीट किए जाने का मामला भी सामने आया है, जिसमें वेटलैंड नियमों का खुला उल्लंघन हुआ। इस कार्य में कैंपा के उच्च अधिकारी श्रीनिवास राव की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। यह कार्य कथित रूप से वन मंत्री के प्रभाव में कराया गया, जो माननीय सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है।
रंग चयन पर विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों का कहना है कि स्टेडियम के मुख्य द्वार का रंग और डिजाइन का चुनाव बेहद सोच-समझ कर किया जाना चाहिए। यह केवल सौंदर्य या पहचान ही नहीं, बल्कि दर्शकों, खिलाड़ियों और आयोजकों पर भी गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालता है।
भारतीय संस्कृति में केसरिया रंग उत्साह और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, जबकि नीला रंग शांति और पेशेवराना माहौल देता है। हरे रंग का भी महत्व है, मगर धार्मिक प्रतीकों से जुड़े रंग संयोजन को सार्वजनिक खेल स्थलों पर लगाने से विवाद की आशंका रहती है।
लोगों की मांग
स्थानीय नागरिकों और सनातन संगठनों की मांग है कि स्टेडियम के मुख्य द्वार को तत्काल बदला जाए और उस पर भारतीय संस्कृति, खेल भावना और स्थानीय परंपराओं के अनुरूप डिजाइन तैयार किया जाए। साथ ही पूरे निर्माण कार्य और टेंडर प्रक्रिया की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए, ताकि इस तरह की साजिशें भविष्य में न हो सकें।
सरकार और प्रशासन की चुप्पी
फिलहाल राज्य सरकार और खेल प्राधिकरण की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। मगर सोशल मीडिया पर लगातार बढ़ते आक्रोश और लोगों की भावनाओं को देखते हुए उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही इस पर कोई निर्णय लिया जाएगा।
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