22 आबकारी अफसरों गिरफ्तारी की फाइल फिर खुली, ACB की खामोशी पर सवाल तेज

The file of arrest of 22 excise officers reopened, questions on ACB's silence intensify। 22 आबकारी अफसरों गिरफ्तारी की फाइल फिर खुली, ACB की खामोशी पर सवाल तेज
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22 आबकारी अफसरों गिरफ्तारी की फाइल फिर खुली, ACB की खामोशी पर सवाल तेज

22 आबकारी अफसरों की फाइल फिर खुली, ACB की खामोशी पर सवाल तेज

रायपुर। बिट्टू बघेल के खिलाफ ED की कार्रवाई के बाद छत्तीसगढ़ में एक बार फिर राज्य की भ्रष्टाचार-निवारक एजेंसियाँ — ACB और EOW — सवालों के घेरे में हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब इस मामले में Predicate Offence यानी भ्रष्टाचार की FIR पहले से दर्ज है, तो फिर राज्य की एजेंसियाँ अब तक चुप क्यों हैं?

चार्जशीट, लेकिन कोई गिरफ्तारी नहीं: पुरानी फाइल फिर चर्चा में

इस प्रकरण ने एक बार फिर उस बहुचर्चित आबकारी घोटाले की याद ताज़ा कर दी है, जिसमें 22 आबकारी अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी। उस समय भी ACB ने किसी को गिरफ्तार नहीं किया, जिससे कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए पूछा था:

> “क्या भ्रष्टाचारियों के लिए बेल बिफोर अरेस्ट अब नया फॉर्मूला बन गया है?”

अब वही पैटर्न बिट्टू बघेल के मामले में भी दोहराया जा रहा है। ACB‑EOW की कार्रवाई फाइलों से बाहर निकल ही नहीं रही।

ACB‑EOW प्रमुख की भूमिका कटघरे में

इस मुद्दे पर विशेष नजर इसलिए भी है क्योंकि वर्तमान ACB‑EOW प्रमुख वही वरिष्ठ अधिकारी हैं, जिन पर खुद पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बलौदा बाजार प्रकरण में सवाल उठाए थे। अब उन्हीं के कार्यकाल में एक गंभीर भ्रष्टाचार प्रकरण ठंडे बस्ते में चला जाना, संदेह और आलोचना दोनों को जन्म दे रहा है।

प्रश्न उठ रहे हैं:

क्या अफसर जानबूझकर कार्रवाई से बच रहे हैं?

क्या उच्च स्तर पर "सत्ता संरक्षण" के संकेत मिल रहे हैं?

क्या जांच एजेंसियाँ निष्पक्ष रह भी पा रही हैं?

राजनीतिक संबंधों की वजह से कार्रवाई रुकी?

बिट्टू बघेल का नाम सामने आते ही यह चर्चा भी गर्म है कि उनके तार पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से जुड़े होने की वजह से यह कार्रवाई जानबूझकर रोकी जा रही है।

राजनीतिक हलकों में इसे “अपनों को बचाने की कोशिश” के रूप में देखा जा रहा है, जिससे राज्य की जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता और पेशेवर प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

ED सक्रिय, ACB निष्क्रिय— जिम्मेदारी किसकी?

जहाँ एक ओर प्रवर्तन निदेशालय (ED) दिल्ली से सक्रिय होकर जांच और गिरफ्तारी की कार्यवाही कर रहा है, वहीं राज्य की एजेंसियाँ मूक दर्शक बनी हुई हैं। ऐसे में यह सवाल प्रासंगिक है:

> “अगर गिरफ्तारी ED करेगी, और जमानत ACB दिलाएगी — तो फिर कार्रवाई कौन करेगा?”

भ्रष्टाचार पर 'जीरो टॉलरेंस' सिर्फ नारा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने हालिया भाषणों में भ्रष्टाचार के प्रति "जीरो टॉलरेंस" की नीति की बात दोहराई थी। लेकिन छत्तीसगढ़ में यह नीति ज़मीन पर उतरती दिखाई नहीं दे रही।

राज्य की जांच एजेंसियाँ या तो राजनीतिक इशारों का इंतजार कर रही हैं, या फिर फाइलों में सच्चाई को दफन कर रही हैं।

बिट्टू बघेल मामला: एक टेस्ट केस बन गया है

यह मामला अब सिर्फ एक अधिकारी की गिरफ्तारी या चार्जशीट का नहीं है। यह ACB‑EOW जैसी संस्थाओं की कार्यशैली, स्वतंत्रता और सार्वजनिक जवाबदेही का लिटमस टेस्ट बन गया है।

अगर यही मौन और निष्क्रियता बनी रही, तो यह मान लेना गलत नहीं होगा कि राज्य की जांच एजेंसियाँ अब राजनीतिक कमांड रूम में तब्दील हो चुकी हैं।

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