"राहुल गांधी ने माना कांग्रेस ने ओबीसी को किया नजरअंदाज, बीजेपी को मिला मौका?"
ओबीसी राजनीति में राहुल गांधी की स्वीकारोक्ति और कांग्रेस की विफलताएं, क्या बीजेपी को मिलेगा लाभ?
नई दिल्ली/रायपुर/भोपाल। कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ओबीसी वर्ग को लेकर अपनी रणनीतिक चूक को स्वीकार करते हुए कहा कि वह इस वर्ग के हितों की उतनी रक्षा नहीं कर सके, जितनी उन्हें करनी चाहिए थी। राजधानी दिल्ली में आयोजित 'भागीदारी न्याय महासम्मेलन' में बोलते हुए उन्होंने कहा कि जातिगत जनगणना को समय रहते न करवा पाना उनकी "गलती" थी, जिसे अब वे सुधारना चाहते हैं।
राहुल गांधी के "आईकॉन" ओबीसी नेता, भ्रष्टाचार के घेरे में
राहुल गांधी भले ही ओबीसी समाज की वकालत कर रहे हों, लेकिन जिन नेताओं को वह इस वर्ग के प्रतिनिधि और "आईकॉन" मानते हैं — जैसे कि भूपेश बघेल (छत्तीसगढ़), अशोक गहलोत और सचिन पायलट (राजस्थान), कमलनाथ (मध्य प्रदेश) — उन पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। इन नेताओं के कार्यकाल में ओबीसी समाज का अपेक्षित विकास नहीं हुआ। उल्टा, आरोप लगते रहे कि इन्होंने अपने राजनीतिक और पारिवारिक हितों को प्राथमिकता दी।
छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल को लेकर ओबीसी समाज में व्यापक असंतोष देखा जा रहा है। जब वे सत्ता में आए थे, तब समाज ने उनसे उम्मीदें बांधी थीं, लेकिन समय के साथ निराशा ने जगह ले ली। यही कारण है कि ओबीसी, दलित और आदिवासी वर्ग अब कांग्रेस से दूरी बना रहे हैं, जिसका सीधा राजनीतिक लाभ भाजपा को मिल रहा है।
राहुल गांधी ने जताई गलती, अब करेंगे सुधार
राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस शासित सभी राज्यों में जातिगत जनगणना करवाई जाएगी। उन्होंने कहा, “ओबीसी, दलित और आदिवासी देश की उत्पादक शक्ति हैं, लेकिन उन्हें उनके श्रम का पूरा फल नहीं मिल रहा है। आरएसएस और बीजेपी ने जानबूझकर ओबीसी का इतिहास मिटाने की कोशिश की है।”
तेलंगाना में हुई प्रदेश नेतृत्व की बैठक में भी उन्होंने स्वीकार किया था कि कांग्रेस पार्टी ने बीते 10–15 वर्षों में ओबीसी वर्ग को वह महत्व नहीं दिया, जो देना चाहिए था। उन्होंने कहा कि "हमने जो जगह छोड़ी, वहीं भाजपा ने कब्जा कर लिया।"
कांग्रेस के "ओबीसी कार्ड" की राजनीति नाकाम?
राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में हालिया चुनावों में कांग्रेस की हार और भाजपा की जीत इस बात की तस्दीक करती है कि ओबीसी और दलित राजनीति में कांग्रेस का प्रभाव लगातार कमजोर हुआ है।
अब जबकि बिहार चुनाव नजदीक हैं, जातिगत जनगणना का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। लेकिन, इस बार कांग्रेस की बजाय बीजेपी इस मुद्दे पर आक्रामक नजर आ रही है, और इसका लाभ उसे मिलना तय माना जा रहा है। कांग्रेस की देरी और असमंजस ने उसे पिछड़ने पर मजबूर कर दिया है।
आगे की राह?
अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या राहुल गांधी की स्वीकारोक्ति और कांग्रेस की नई पहलें ओबीसी, दलित और आदिवासी समाज का भरोसा फिर से जीत पाएंगी, या भाजपा इन वर्गों के बीच अपनी पकड़ और मजबूत करने में कामयाब रहेगी?
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