बलूचिस्तान स्वतंत्र राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर, भारत से मांगी समर्थन की अपील – एम्बेसी खोलने की अनुमति भी मांगी
बलूचिस्तान स्वतंत्र राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर, भारत से मांगी समर्थन की अपील – एम्बेसी खोलने की अनुमति भी मांगी
नेशनल डेस्क बलूचिस्तान, 19 मई 2025 — पाकिस्तान के अशांत प्रांत बलूचिस्तान में स्वतंत्रता की मांग एक बार फिर जोर पकड़ रही है। बलूच राष्ट्रवादियों ने अब खुलकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से समर्थन मांगना शुरू कर दिया है। हाल ही में बलूच स्वतंत्रता समर्थकों की ओर से भारत सरकार से एक विशेष अपील की गई है, जिसमें उन्होंने भारत से बलूचिस्तान को समर्थन देने और देश की राजधानी में बलूचिस्तान की एक प्रतिनिधि एम्बेसी खोलने की अनुमति देने की मांग की है।
बलूच नेताओं का कहना है कि दशकों से वे पाकिस्तान सरकार द्वारा हो रहे शोषण, मानवाधिकार उल्लंघन और आर्थिक उपेक्षा के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। उनका मानना है कि अब समय आ गया है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से भारत जैसे पड़ोसी लोकतांत्रिक देश, बलूच आंदोलन को नैतिक और राजनीतिक समर्थन दें।
एक बलूच प्रवक्ता ने बयान में कहा, "हम भारत से अनुरोध करते हैं कि वह हमारे संघर्ष को समझे और बलूचिस्तान की स्वतंत्रता की दिशा में हमारे साथ खड़ा हो। हम भारत की राजधानी में एक प्रतिनिधि मिशन या एम्बेसी खोलने की अनुमति चाहते हैं, ताकि हमारी आवाज़ अधिक सशक्त तरीके से सुनी जा सके।"
हालांकि, भारत सरकार की ओर से इस संबंध में अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। भारत ने पहले कुछ अवसरों पर बलूचिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघनों पर चिंता व्यक्त की है, लेकिन बलूचिस्तान की स्वतंत्रता को लेकर वह अब तक तटस्थ रुख अपनाए हुए है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बलूच आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलती है, तो यह न सिर्फ पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति को झकझोर देगा, बल्कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीति पर भी गहरा असर डालेगा।
अगर बलूचिस्तान एक स्वतंत्र देश बन जाता है, तो इसका चीन पर बड़ा भू-राजनीतिक और आर्थिक असर पड़ेगा। इसका कारण है कि चीन की "चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा" (CPEC) परियोजना का बड़ा हिस्सा बलूचिस्तान से होकर गुजरता है, विशेष रूप से ग्वादर पोर्ट इसका केंद्र बिंदु है।
यहां विस्तार से बताया गया है कि बलूचिस्तान के अलग होने पर चीन को कैसे-कैसे नुकसान हो सकता है:
1. CPEC पर खतरा
CPEC चीन की Belt and Road Initiative (BRI) का प्रमुख हिस्सा है।
यह गलियारा चीन के काशगर शहर से बलूचिस्तान के ग्वादर पोर्ट तक जाता है।
बलूचिस्तान के स्वतंत्र होने पर यह परियोजना एक स्वतंत्र देश की सीमा में आ जाएगी, जिससे चीन को कानूनी, सुरक्षा और कूटनीतिक चुनौतियां झेलनी पड़ेंगी।
2. ग्वादर पोर्ट पर नियंत्रण का संकट
चीन ने ग्वादर पोर्ट में अरबों डॉलर का निवेश किया है और दीर्घकालिक लीज पर उसे ऑपरेट कर रहा है।
अगर बलूचिस्तान अलग देश बनता है और चीन के प्रभाव के खिलाफ नीति अपनाता है, तो ग्वादर चीन के हाथ से निकल सकता है, जिससे उसके हिंद महासागर में पहुंच पर असर पड़ेगा।
3. सुरक्षा और स्थिरता का खतरा
चीन बलूचिस्तान में अपने इंजीनियरों और निवेशकों की सुरक्षा को लेकर पहले से चिंतित रहा है।
अगर वहां सरकार बदलती है या चीन विरोधी नीति आती है, तो सुरक्षा जोखिम और बढ़ जाएंगे।
4. भू-राजनीतिक झटका
बलूचिस्तान का अलग होना पाकिस्तान की कमजोर स्थिति को उजागर करेगा, और इससे चीन के एक मजबूत रणनीतिक साझेदार पर असर पड़ेगा।
भारत, अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों को बलूचिस्तान में रणनीतिक प्रभाव जमाने का मौका मिल सकता है, जिससे चीन को सीधे टक्कर मिलेगी।
5. ऊर्जा और व्यापार मार्ग पर असर
CPEC से चीन को मध्य-पूर्व से तेल और गैस जल्दी और सस्ता मिलता है।
बलूचिस्तान के अलग होने से ये रूट बाधित हो सकते हैं या चीन को नई डील्स और रूट्स खोजने पड़ सकते हैं।
निष्कर्ष
बलूचिस्तान के स्वतंत्र होने की स्थिति में चीन को आर्थिक, रणनीतिक और भू-राजनीतिक स्तर पर बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए चीन बलूच आंदोलन को लेकर सतर्क रहता है और पाकिस्तान के साथ मिलकर वहां स्थिरता बनाए रखने की कोशिश करता है।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0