"आदिवासी बनाम वीआईपी नेता? चैतन्य की गिरफ्तारी पर कांग्रेस सड़कों पर, लखमा के लिए चुप्पी क्यों?"
छत्तीसगढ़ में दोहरे राजनीतिक रवैये पर उठे सवाल: चैतन्य बघेल के लिए नाकेबंदी, लेकिन कवासी लखमा के लिए सन्नाटा क्यों?
रायपुर, 22 जुलाई 2025। छत्तीसगढ़ की राजनीति इस समय भारी उबाल पर है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल की प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा गिरफ्तारी के बाद आज प्रदेशभर में कांग्रेस ने आर्थिक नाकेबंदी कर विरोध दर्ज कराया। दोपहर 12:00 से 2:00 बजे तक आयोजित इस प्रदर्शन में कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ देखी गई, जो केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की विष्णुदेव साय सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाज़ी करती नज़र आई।
लेकिन इस नाकेबंदी ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है — क्या कांग्रेस पार्टी आदिवासी नेताओं के साथ भेदभाव कर रही है?
कवासी लखमा की गिरफ्तारी पर क्यों नहीं हुआ विरोध?
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के पूर्व आबकारी मंत्री और वरिष्ठ आदिवासी नेता कवासी लखमा को भी इसी शराब घोटाले में पहले ही जेल भेजा जा चुका है। लेकिन उनकी गिरफ्तारी के समय कांग्रेस पार्टी का कोई बड़ा प्रदर्शन या नाकेबंदी नहीं हुई थी। न ही कोई बड़ा नेता उनके समर्थन में सामने आया। यह तब है जब लखमा कांग्रेस के एक प्रमुख आदिवासी चेहरा रहे हैं।
"आदिवासियों की राजनीति सिर्फ मंचों तक?"
कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व — खासकर राहुल गांधी — अक्सर संविधान की प्रतिकृति हाथ में लेकर दलित और आदिवासी अधिकारों की बात करते हैं। लेकिन स्थानीय स्तर पर आदिवासी नेताओं के साथ व्यवहार में यह प्रतिबद्धता कहां गायब हो जाती है, यह अब सवालों के घेरे में है।
सूत्रों के अनुसार, कवासी लखमा के बेटे हरीश लखमा ने भी कई बार कहा है कि "मेरे पिता को साजिशन फंसाया गया है, और कांग्रेस पार्टी का कोई समर्थन नहीं मिल रहा है।" यह बयान कांग्रेस के आंतरिक समीकरणों को लेकर गहरी असंतोष की ओर इशारा करता है।
बीजेपी का आरोप: "लखमा को केवल मोहरा बनाया गया"
वहीं राज्य के उपमुख्यमंत्री और बीजेपी नेता अरुण साव ने भी इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, "कवासी लखमा को केवल एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया। शराब घोटाले की असली रूपरेखा भूपेश बघेल और उनके करीबी लोगों ने बनाई थी, लेकिन दोष लखमा पर मढ़ा गया।"
जनता में नाराजगी और कांग्रेस के लिए संदेश
इस प्रकरण ने आदिवासी समुदाय के बीच भी असंतोष को जन्म दिया है। कई सामाजिक संगठनों और युवाओं का मानना है कि जब चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी पर कांग्रेस इतनी सक्रिय है, तो एक आदिवासी मंत्री के लिए चुप्पी क्यों?
यह राजनीतिक घटनाक्रम कांग्रेस के उस नैरेटिव को भी कमजोर करता है, जिसमें वह खुद को आदिवासी और दलित हितैषी बताती है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस इस आलोचना का कोई जवाब देती है, या फिर यह चुप्पी आगे और सवाल खड़े करेगी।
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