Raipur Central Jail or Central Resort? रायपुर सेंट्रल जेल या सेंट्रल रिसॉर्ट?—अंदर की दुनिया का काला सच
रायपुर सेंट्रल जेल या सेंट्रल रिसॉर्ट?—अंदर की दुनिया का काला सच
रायपुर | विशेष रिपोर्ट श्रीप्रकाश तिवारी
रायपुर सेंट्रल जेल — नाम तो “जेल” है, लेकिन अंदर की हकीकत सुनकर कोई भी कह उठेगा कि यह किसी “सेंट्रल रिसॉर्ट” से कम नहीं। एक भूतपूर्व कैदी ने नाम न उजागर करने की शर्त पर कहा
“भाईसाहब, ये जेल नहीं, रायपुर सेंट्रल रिसॉर्ट है! यहाँ कैदी नहीं, मेहमान ठहरते हैं। बस फर्क इतना है कि चेक-इन पुलिस कराती है और चेक-आउट अदालत तय करती है।”
जेल प्रशासन के भीतर की यह दुनिया ऐसे “रेट कार्ड” पर चलती है जहाँ आज़ादी छोड़कर बाकी हर सुविधा खरीदी जा सकती है। अंदर की काली कमाई ऊपर से नीचे तक ऐसे बहती है जैसे गंगा हर घाट तक पहुँचती है—हर कोई इस धारा से हिस्सा लेता है।
पाँच सितारा बैरक — “छोटी गोल”
कैदियों के बीच सबसे ज़्यादा माँग “छोटी गोल” नाम की बैरक की होती है, जिसे बड़े प्यार से “नई जेल” या “पाँच सितारा सूट” कहा जाता है। यहाँ रुकने की कीमत किसी लग्ज़री होटल से कम नहीं। सूत्र बताते हैं कि ठहरने का किराया 50,000 रुपये से लेकर पाँच लाख रुपये प्रतिमाह तक है—बस आपकी जेब और आपके जुर्म का साइज बड़ा होना चाहिए।
शराब और नशे की खुली डील
शाम की बोरियत मिटानी हो तो जेल में सब इंतज़ाम मौजूद है। सिपाही खुद थर्मस या मिल्टन की बोतल में “ठंडी शराब” पहुँचा देते हैं। ब्रांड वही जो कैदी बाहर पीता था—बशर्ते, वह ब्रांड का “रेट” भी बाहर वाला ही चुकाए।
गांजा, गुटखा, सिगरेट जैसी चीज़ें भी “डिलीवरी सर्विस” से कम नहीं। गांजा 500 से 1000 रुपये, गुटखा 100 से 500 रुपये और सिगरेट 1000 से 2000 रुपये में उपलब्ध। डिलीवरी का तरीका भी फिल्मी है—दीवार के पार से फेंकी गई टेनिस या फुटबॉल में “माल” पैक रहता है, और जेल के भीतर सीधा “राइट हैंड” तक पहुँचता है। जाहिर है, यह सब बिना अंदर की “सेटिंग” के संभव नहीं।
मोबाइल और इंटरनेट का वीआईपी पैक
कागज़ों में जेल में “जैमर” लगा है, पर हकीकत में यह सिर्फ जनता के लिए जुमला है। वीआईपी कैदियों के पास स्मार्टफोन मौजूद हैं। 25,000 रुपये महीना देकर “कनेक्टेड रहने की सुविधा” पक्की है। यही वजह है कि कई बार जेल से कैदियों के वीडियो वायरल हो चुके हैं, जिनमें वे आराम से जिम करते, सेल्फी लेते नज़र आते हैं।
मोबाइल चार्जिंग का जुगाड़ भी कमाल का है—टीवी के स्विच में चार्जर लगाओ और नेटफ्लिक्स या सोशल मीडिया का मज़ा जेल के अंदर से लो।
“गरीब कैदी” के लिए भी ऑफर
जो कैदी “प्रीमियम पैक” नहीं ले सकते, उनके लिए भी सुविधा है। सिर्फ दो से पाँच हज़ार रुपये देकर हफ्ते में पाँच मिनट की कॉल टाइम की गारंटी—“फोन कॉल प्लान” नाम से। कई बार जेल के टावर से कॉल आते हैं—“भैया, नेटवर्क जेल में थोड़ा कम आता है!”
जेल या बिज़नेस हब?
इन सबके बीच बड़ा सवाल उठता है—क्या रायपुर सेंट्रल जेल सुधार गृह है या भ्रष्टाचार का केंद्र? एक तरफ जेल प्रशासन अनुशासन और सुधार की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ अंदर का कारोबार खुलेआम चलता है। हर सुविधा का रेट फिक्स है और हर कैदी की जेब के हिसाब से “प्लान” तय होता है।
कुल मिलाकर, रायपुर सेंट्रल जेल अब सज़ा की जगह नहीं, बल्कि “सुविधा की सेंट्रल जेल” बन चुकी है—जहाँ हर गुनाह की प्रीमियम मेंबरशिप उपलब्ध है। यहाँ न्याय की नहीं, “जुगाड़ की” जीत होती है।
अगर यही हाल रहा, तो आने वाले वक्त में जेलों के बोर्ड पर लिखा जाएगा—
“रायपुर सेंट्रल जेल में आपका स्वागत है — जहाँ हर कैदी है वीआईपी।”
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