रायपुर CMHO डॉ. मिथिलेश चौधरी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, आखिर किसके संरक्षण में चल रहा पूरा खेल?
रायपुर CMHO डॉ. मिथिलेश चौधरी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, आखिर किसके संरक्षण में चल रहा पूरा खेल?
राजनांदगांव में नियुक्तियों और आर्थिक अनियमितताओं के आरोपों से लेकर रायपुर में आयुष्मान कार्ड, दवा खरीदी और अस्पतालों की जांच तक उठ रहे सवाल; स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल की भूमिका पर भी सवाल
रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. मिथिलेश चौधरी की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। राजनांदगांव में पदस्थापना के दौरान कथित अनियमितताओं और नियुक्तियों से जुड़े आरोपों से लेकर रायपुर में आयुष्मान कार्ड, दवा खरीदी तथा अस्पतालों की निगरानी व्यवस्था तक कई मुद्दों पर सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर राजधानी रायपुर जैसे महत्वपूर्ण जिले में लंबे समय से पदस्थ अधिकारी की कार्यप्रणाली की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं कराई जा रही है?
स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व वाले प्रदेश सरकार के सामने भी यह सवाल है कि स्वास्थ्य विभाग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? हालांकि, संबंधित अधिकारी के खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों की स्वतंत्र जांच और आधिकारिक निष्कर्ष सामने आना जरूरी है।
चार साल से रायपुर में पदस्थ, कार्यकाल को लेकर भी सवाल
डॉ. मिथिलेश चौधरी पिछले करीब चार वर्षों से रायपुर जिले में CMHO की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इतने लंबे समय तक राजधानी के स्वास्थ्य विभाग की कमान एक ही अधिकारी के पास रहने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप लगाने वालों का कहना है कि रायपुर में अस्पतालों की निगरानी, स्वास्थ्य योजनाओं के क्रियान्वयन और नियमों के पालन की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी के कार्यकाल की समीक्षा होनी चाहिए।
सवाल यह भी है कि यदि किसी अधिकारी के पुराने कार्यकाल को लेकर गंभीर शिकायतें सामने आती हैं, तो विभागीय स्तर पर उनकी जांच और वर्तमान पदस्थापना की समीक्षा किस आधार पर की जाती है?
राजनांदगांव में नियुक्तियों और आर्थिक अनियमितताओं के आरोप
डॉ. मिथिलेश चौधरी जब राजनांदगांव में CMHO के पद पर पदस्थ थे, उस दौरान उनके और अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ कथित आर्थिक हेराफेरी, अनियमित नियुक्तियों तथा शासन को आर्थिक नुकसान पहुंचाने जैसे आरोप लगाए गए थे।
इन आरोपों में वर्ष 2017 में वाहन चालक की नियुक्ति में कथित अनियमितता का मामला भी शामिल बताया जाता है। इसके अलावा स्वास्थ्य एवं बहुउद्देशीय कर्मचारियों की नियुक्तियों में कथित तौर पर अपात्र तथा प्रतीक्षारत उम्मीदवारों को अनुचित तरीके से नियुक्त किए जाने के आरोप भी सामने आए थे।
इन मामलों को लेकर आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) में शिकायत किए जाने और जांच की बात कही जा रही है। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि शिकायतों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है, जांच किस स्तर पर है और संबंधित आरोपों के संबंध में विभाग के पास क्या रिकॉर्ड उपलब्ध हैं।
महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि पुराने कार्यकाल से संबंधित शिकायतों की जांच लंबित है, तो वर्तमान पदस्थापना के दौरान निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए विभाग ने क्या कदम उठाए हैं?
आयुष्मान कार्ड और दवा खरीदी को लेकर भी उठ रहे सवाल
रायपुर जिले में आयुष्मान भारत योजना के क्रियान्वयन, दवाओं की खरीदी और निजी अस्पतालों की निगरानी को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप हैं कि कुछ अस्पतालों में योजनाओं और स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित नियमों का पालन नहीं हो रहा है। वहीं, दवा खरीदी की प्रक्रिया और अस्पतालों के निरीक्षण को लेकर भी पारदर्शिता की मांग की जा रही है।
यदि इन मामलों में अनियमितताएं हुई हैं, तो यह केवल विभागीय लापरवाही का विषय नहीं, बल्कि आम मरीजों के अधिकारों और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर मामला है।
आयुष्मान कार्ड योजना का उद्देश्य पात्र मरीजों को उपचार की सुविधा उपलब्ध कराना है। ऐसे में योजना के तहत अस्पतालों में होने वाले उपचार, भुगतान और दावों की नियमित जांच आवश्यक है। इसी तरह दवा खरीदी में भी गुणवत्ता, दरों, आपूर्ति और भुगतान से संबंधित रिकॉर्ड की जांच होनी चाहिए।
अस्पतालों से वसूली के आरोप, जांच से सामने आएगी सच्चाई?
आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि नर्सिंग होम एक्ट और अन्य निर्धारित नियमों के तहत अस्पतालों की निगरानी तथा कार्रवाई की प्रक्रिया में कथित तौर पर अनियमितताएं हो रही हैं। कुछ सूत्रों के हवाले से निजी अस्पतालों से कथित वसूली किए जाने और इसमें कुछ अन्य लोगों की भूमिका होने की बातें भी कही जा रही हैं।
यह भी दावा किया जा रहा है कि जिले के अस्पतालों से हर महीने बड़ी रकम वसूले जाने का कथित खेल चल रहा है। हालांकि, इन आरोपों के समर्थन में उपलब्ध दस्तावेज, संबंधित अस्पतालों के बयान, वित्तीय लेनदेन के प्रमाण और किसी आधिकारिक जांच के निष्कर्ष सामने आना जरूरी है।
यदि अस्पतालों से अवैध वसूली की शिकायतें हैं, तो स्वास्थ्य विभाग को संबंधित अस्पतालों के संचालकों के बयान दर्ज कराकर, निरीक्षण रिपोर्ट, शिकायतों और वित्तीय रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और यदि अनियमितता हुई है, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है।
मंत्री को कमीशन देने की चर्चा, दावों की पुष्टि जरूरी
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर आरोप कथित कमीशनखोरी और राजनीतिक संरक्षण को लेकर लगाए जा रहे हैं। कुछ लोगों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि डॉ. मिथिलेश चौधरी अपने प्रभाव और राजनीतिक पहुंच का उल्लेख करते हैं। यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होने के पीछे कथित संरक्षण की भूमिका हो सकती है।
कुछ सूत्रों के अनुसार, अधिकारी द्वारा कथित तौर पर स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल को भारी-भरकम कमीशन देने की बातें भी कही जाती हैं। यदि इस तरह के दावे किए जा रहे हैं, तो उनकी स्वतंत्र पुष्टि, संबंधित पक्षों का बयान और ठोस साक्ष्य आवश्यक हैं। बिना प्रमाण इन आरोपों को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
इसी तरह पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उनके बेटे अभिषेक सिंह से नजदीकी या पहचान होने का हवाला दिए जाने की बातें भी कही जा रही हैं। इन दावों की भी स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। किसी व्यक्ति की कथित राजनीतिक पहचान अपने आप में किसी आरोप का प्रमाण नहीं होती।
आखिर स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था कहां है?
रायपुर प्रदेश की राजधानी है। यहां बड़े सरकारी अधिकारी, मंत्री और स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी बैठते हैं। इसके बावजूद यदि अस्पतालों की निगरानी, आयुष्मान योजना के क्रियान्वयन और दवा खरीदी में अनियमितताओं की शिकायतें सामने आती हैं, तो यह विभागीय निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
सवाल यह है कि निजी अस्पतालों के निरीक्षण की नियमित समीक्षा कौन कर रहा है? आयुष्मान योजना के तहत अस्पतालों के दावों और भुगतान की जांच किस स्तर पर हो रही है? दवा खरीदी की प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्था है? और यदि किसी अधिकारी के खिलाफ पुराने मामलों में शिकायतें हैं, तो उन पर कार्रवाई की स्थिति सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
इन सवालों का जवाब केवल आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि दस्तावेजों, जांच रिपोर्टों और जवाबदेह कार्रवाई से मिलना चाहिए।
जनता के स्वास्थ्य से जुड़ा मामला, निष्पक्ष जांच की मांग
स्वास्थ्य विभाग का काम आम जनता को बेहतर उपचार उपलब्ध कराना और सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुंचाना है। ऐसे में यदि किसी अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार, अवैध वसूली, नियुक्तियों में अनियमितता या सरकारी धन के दुरुपयोग जैसे आरोप लगाए जाते हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच कराना सरकार और विभाग की जिम्मेदारी है।
अब बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रदेश सरकार डॉ. मिथिलेश चौधरी के खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों की निष्पक्ष जांच कराएगी? क्या राजनांदगांव में नियुक्तियों और आर्थिक अनियमितताओं से संबंधित शिकायतों की स्थिति सार्वजनिक की जाएगी? क्या रायपुर जिले में आयुष्मान कार्ड योजना, दवा खरीदी और निजी अस्पतालों की निगरानी व्यवस्था का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाएगा?
फिलहाल, इन आरोपों पर संबंधित अधिकारी, स्वास्थ्य मंत्री और स्वास्थ्य विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना भी जरूरी है। जांच और दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। लेकिन आम जनता के स्वास्थ्य और सरकारी धन से जुड़े इन सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
सवाल कायम है—यदि शिकायतें और आरोप सामने आ रहे हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच कब होगी और जिम्मेदारी किसकी तय की जाएगी?
डॉ मिथिलेश चौधरी के भ्रष्टाचार की परतों का अगला अंक जल्द ही
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