डिजिटल माध्यमों से छत्तीसगढ़ की लोककलाओं को दुनिया तक पहुंचाएं: राज्यपाल रमेन डेका
डिजिटल माध्यमों से छत्तीसगढ़ की लोककलाओं को दुनिया तक पहुंचाएं: राज्यपाल रमेन डेका
खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय के 70वें स्थापना दिवस समारोह में राज्यपाल ने कला, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण पर दिया जोर
खैरागढ़/रायपुर, 14 अक्टूबर। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोककलाओं और सांस्कृतिक विरासत को डिजिटल माध्यमों के जरिए देश-दुनिया तक पहुंचाने की जरूरत है। मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल मीडिया के माध्यम से प्रदेश की पारंपरिक कलाओं को वैश्विक पहचान दिलाई जा सकती है। यह बात राज्यपाल एवं कुलाधिपति रमेन डेका ने खैरागढ़ स्थित राजकुमारी इंदिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय के 70वें स्थापना दिवस समारोह में कही। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की लोककलाएं प्रदेश की पहचान हैं और इन्हें संरक्षित करने के साथ नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी जरूरी है।
विश्वविद्यालय के 70वें स्थापना दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल राज्यपाल ने संस्थान की सात दशक लंबी गौरवशाली यात्रा की सराहना की। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की उपलब्धियां विद्यार्थियों, शिक्षकों और कर्मचारियों के सामूहिक प्रयासों का परिणाम हैं। इस संस्थान ने कला और संगीत के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।
पंडवानी, पंथी और राउत नाचा को मिले वैश्विक पहचान
राज्यपाल रमेन डेका ने छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोककला परंपराओं का उल्लेख करते हुए पंडवानी, पंथी, राउत नाचा, सुवा नृत्य, कर्मा और बस्तर की जनजातीय नृत्य शैलियों को प्रदेश की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर बताया। उन्होंने कहा कि इन लोककलाओं में छत्तीसगढ़ की परंपराओं, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक मूल्यों की झलक दिखाई देती है।
उन्होंने जोर दिया कि आधुनिक तकनीक का उपयोग कर इन कलाओं को व्यापक मंच प्रदान किया जाना चाहिए। डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया और इंटरनेट के माध्यम से स्थानीय कलाकार अपनी प्रस्तुतियों को देश-विदेश के दर्शकों तक पहुंचा सकते हैं। इससे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान मजबूत होने के साथ कलाकारों के लिए नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
कला में सफलता के लिए प्रतिभा के साथ समर्पण जरूरी
राज्यपाल ने कहा कि संगीत मनुष्य को मानसिक शांति प्रदान करता है, वहीं नृत्य, चित्रकला और शिल्प समाज के इतिहास, संस्कृति और जीवनशैली को अभिव्यक्त करने के सशक्त माध्यम हैं। कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक पहचान और संवेदनाओं को समझने का माध्यम भी है।
उन्होंने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि कला के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए प्रतिभा के साथ धैर्य, निरंतर अभ्यास और समर्पण आवश्यक है। विद्यार्थियों को अपनी कला को निखारने के लिए लगातार प्रयास करना चाहिए और पारंपरिक विरासत को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाना चाहिए।
राज्यपाल ने कला को आजीविका और व्यवसाय से जोड़ने की संभावनाओं पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि कला के क्षेत्र में रोजगार और स्वरोजगार के अवसर विकसित किए जा सकते हैं। इसके लिए कलाकारों को अपनी प्रतिभा के साथ नए माध्यमों और बदलती तकनीक को अपनाने की दिशा में भी प्रयास करना चाहिए।
खैरागढ़ को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में विश्वविद्यालय की अहम भूमिका
समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित सांसद संतोष पांडे ने कहा कि राजपरिवार की दूरदर्शी पहल से स्थापित इस विश्वविद्यालय ने खैरागढ़ को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान दिलाई है। संस्थान ने कला और संगीत की शिक्षा को बढ़ावा देने के साथ क्षेत्र की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा को भी मजबूत किया है।
उन्होंने विश्वविद्यालय की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने और कला-संगीत के क्षेत्र में नई उपलब्धियां हासिल करने के महत्व को रेखांकित किया।
राजपरिवार के योगदान को किया याद
राज्यपाल रमेन डेका ने विश्वविद्यालय की स्थापना में दानवीर राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और रानी पद्मावती के योगदान को याद किया। उन्होंने बताया कि अपनी पुत्री राजकुमारी इंदिरा सिंह की स्मृति में विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए दिए गए उनके योगदान ने कला शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण आधार तैयार किया।
कार्यक्रम की शुरुआत विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. लवली शर्मा के स्वागत उद्बोधन से हुई। समारोह में राजपरिवार की सदस्य राजकुमारी शताक्षी सिंह, सांसद प्रतिनिधि भागवत शरण सिंह, प्रभारी कुलसचिव आर. वेंकट रमण गुड़े, जिला प्रशासन के अधिकारी, जनप्रतिनिधि, प्राध्यापक, विद्यार्थी और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
विश्वविद्यालय का 70वां स्थापना दिवस समारोह कला, संगीत और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के संकल्प के साथ संपन्न हुआ।
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