रायपुर के CMHO डॉ. मिथिलेश चौधरी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, आयुष्मान कार्ड योजना में लूट का खेल
रायपुर के CMHO डॉ. मिथिलेश चौधरी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, आयुष्मान कार्ड योजना में लूट का खेल!
राजनांदगांव में भी भ्रष्टाचार के मामलों में संलिप्तता के आरोप, एंटी करप्शन विभाग में जांच की चर्चा; कार्रवाई के बाद भी अस्पतालों के संचालन पर सवाल
रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. मिथिलेश चौधरी इन दिनों भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों को लेकर चर्चा में हैं। डॉ. मिथिलेश चौधरी वही अधिकारी हैं, जिन पर राजनांदगांव जिले में पदस्थापना के दौरान भी भ्रष्टाचार के कई मामलों में संलिप्तता के आरोप लगाए जाते रहे हैं। खबर यह भी है कि एंटी करप्शन विभाग में उनके खिलाफ जांच चल रही है। हालांकि, इस जांच की वर्तमान स्थिति की आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है।
इसके बावजूद डॉ. मिथिलेश चौधरी के हौसले बुलंद बताए जा रहे हैं। वर्तमान में वे रायपुर के CMHO हैं और राजधानी में आयुष्मान भारत योजना के तहत निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। आरोप हैं कि रायपुर के बड़े-बड़े अस्पतालों में आयुष्मान कार्ड के नाम पर कथित घोटाला किया जा रहा है। दूसरे प्रदेशों से मरीजों को बुलाकर अस्पतालों के डायरेक्टर और संचालक मिलकर सरकारी योजना का दुरुपयोग कर रहे हैं।
आयुष्मान कार्ड योजना में कथित लूट, गरीबों को नहीं मिल रहा लाभ!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी आयुष्मान भारत योजना का उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद परिवारों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है, ताकि आर्थिक तंगी के कारण किसी मरीज को इलाज से वंचित न रहना पड़े। लेकिन छत्तीसगढ़ में इस योजना के क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ निजी अस्पतालों में आयुष्मान कार्ड के नाम पर अनियमितताएं की जा रही हैं। गरीब मरीजों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराने के लिए बनाई गई योजना कहीं कुछ अस्पताल संचालकों के लिए कमाई का जरिया तो नहीं बन गई है? यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, कुछ अस्पतालों को कथित रूप से संरक्षण दिए जाने और मोटे कमीशन के लेन-देन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि डॉ. मिथिलेश चौधरी की भूमिका की जांच की जानी चाहिए। हालांकि, कथित कमीशन के संबंध में स्वतंत्र रूप से पुष्टि करने वाले दस्तावेज सामने आना जरूरी है।
गली-मोहल्लों में खुल रहे अस्पताल, आयुष्मान योजना की निगरानी पर सवाल
छत्तीसगढ़ में गली-मोहल्लों तक निजी अस्पतालों का विस्तार हो रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इन अस्पतालों में मरीजों को किस स्तर की स्वास्थ्य सुविधाएं मिल रही हैं और आयुष्मान भारत योजना के तहत होने वाले उपचार तथा भुगतान की निगरानी किस प्रकार की जा रही है।
सरकार की मंशा है कि गरीब मरीजों को अस्पतालों में बेहतर इलाज मिले और उन्हें आयुष्मान कार्ड का पूरा लाभ प्राप्त हो। लेकिन यदि योजना के नाम पर अनियमितताएं होती हैं और जिम्मेदार अधिकारी प्रभावी कार्रवाई नहीं करते, तो इससे पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।
आरोप है कि कुछ अस्पतालों में मरीजों के इलाज और आयुष्मान योजना के इस्तेमाल में गड़बड़ियां की जा रही हैं। ऐसे मामलों में अस्पतालों के रिकॉर्ड, मरीजों की भर्ती, उपचार और सरकारी भुगतान की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
मेटलाइफ, वर्धमान और लोटस हॉस्पिटल पर कार्रवाई के बाद भी सवाल
हाल ही में मेटलाइफ हॉस्पिटल, वर्धमान हॉस्पिटल, लोटस हॉस्पिटल सहित कई अन्य अस्पतालों को लेकर कार्रवाई की चर्चा सामने आई। लेकिन सवाल यह है कि कार्रवाई के बाद इन अस्पतालों की वर्तमान स्थिति क्या है? क्या वहां मरीजों का इलाज पहले की तरह जारी है? क्या आयुष्मान कार्ड के तहत होने वाले उपचार और भुगतान की निगरानी की जा रही है?
आरोप है कि कार्रवाई के बावजूद कुछ अस्पतालों में धड़ल्ले से मरीजों को भर्ती किया जा रहा है और आयुष्मान योजना के तहत इलाज की प्रक्रिया जारी है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि इन अस्पतालों के खिलाफ किस प्रकार की कार्रवाई की गई और वर्तमान में उनकी कानूनी तथा प्रशासनिक स्थिति क्या है।
जब CMHO डॉ. मिथिलेश चौधरी से कार्रवाई के बाद भी अस्पतालों के संचालन को लेकर सवाल किए जाते हैं, तो उनके हवाले से यह बात कही जाती है कि संबंधित अस्पताल हाईकोर्ट से स्टे लेकर आए हैं।
यदि अस्पतालों को हाईकोर्ट से राहत मिली है, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि न्यायालय का आदेश किस मामले में है और उसका दायरा क्या है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या न्यायालय से राहत मिलने के बाद अस्पतालों में आयुष्मान योजना के तहत होने वाले भुगतान और मरीजों के इलाज की निगरानी की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है? स्वास्थ्य विभाग को इस पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
मंत्रियों और बड़े नेताओं से नजदीकी का कथित दावा
डॉ. मिथिलेश चौधरी को लेकर यह भी आरोप लगाए जाते हैं कि वे मंत्रियों से अपनी सीधी पहचान होने की बात कहते हैं। यह दावा भी किया जाता है कि वे पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उनके पुत्र एवं पूर्व सांसद अभिषेक सिंह के करीबी हैं।
आरोप है कि बड़े नेताओं से नजदीकी का हवाला देकर वे अपने कार्यालय के अधिकारियों और कर्मचारियों पर दबाव बनाते हैं। यदि इस तरह के आरोप सही हैं, तो इसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। किसी भी अधिकारी को राजनीतिक संपर्कों के नाम पर नियमों से ऊपर नहीं माना जा सकता।
हालांकि, इन कथित संबंधों, बयानों और कर्मचारियों को धमकाने के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। संबंधित पक्षों का जवाब भी सामने आना चाहिए।
दवा खरीदी और सप्लाई में भी कथित भ्रष्टाचार के आरोप
डॉ. मिथिलेश चौधरी को लेकर सवाल केवल आयुष्मान कार्ड योजना तक सीमित नहीं हैं। दवाओं की खरीदी, सप्लाई और अन्य विभागीय कार्यों में भी कथित अनियमितताओं के आरोप लगाए जा रहे हैं।
यदि इन मामलों में भ्रष्टाचार हुआ है, तो संबंधित दस्तावेजों, खरीदी प्रक्रिया, सप्लाई रिकॉर्ड और भुगतान की जांच की जानी चाहिए। आखिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में इस्तेमाल होने वाले धन का हिसाब कौन लेगा? क्या विभागीय स्तर पर इन शिकायतों की जांच हो रही है? इन सवालों का जवाब सामने आना चाहिए।
स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल, आपके नाक के नीचे क्या हो रहा है?
छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल से सवाल है कि आखिर राजधानी रायपुर में स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था किस तरह काम कर रही है? यदि निजी अस्पतालों में आयुष्मान योजना के तहत अनियमितताओं की शिकायतें मिल रही हैं, तो उन पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई दे रही है?
आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि कुछ अधिकारी मंत्रियों के नाम का हवाला देकर अपने कामकाज को सही ठहराते हैं। यहां तक कि मंत्री को कमीशन दिए जाने और उनके आदेश पर काम होने जैसी बातें भी कही जाने का दावा किया जा रहा है। हालांकि, इन गंभीर आरोपों की पुष्टि के लिए ठोस सबूत और संबंधित पक्षों का जवाब जरूरी है।
स्वास्थ्य मंत्री को चाहिए कि वे इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराएं। यदि कोई अधिकारी या अस्पताल संचालक भ्रष्टाचार में संलिप्त पाया जाता है, तो उसके खिलाफ नियमानुसार कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
क्या ऐसे चलेगी छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था?
आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि गरीब मरीजों के लिए बनाई गई आयुष्मान भारत योजना का लाभ वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंच रहा है या कहीं इसका दुरुपयोग तो नहीं हो रहा है? यदि अस्पतालों में कथित गड़बड़ियों पर समय रहते रोक नहीं लगाई गई, तो इससे सरकारी धन के साथ-साथ गरीब मरीजों का भरोसा भी प्रभावित होगा।
डॉ. मिथिलेश चौधरी के खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों, निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली और आयुष्मान योजना के तहत होने वाले भुगतान की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। साथ ही, दवा खरीदी और सप्लाई से जुड़े आरोपों की भी पड़ताल की जानी चाहिए।
अब सवाल स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल और स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से है—क्या इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी? क्या आयुष्मान योजना में कथित अनियमितताओं पर रोक लगेगी? और क्या दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी?
गरीबों के इलाज के लिए बनाई गई योजना को किसी भी स्थिति में कथित भ्रष्टाचार का माध्यम नहीं बनने दिया जाना चाहिए। जनता को जवाब चाहिए और स्वास्थ्य विभाग को अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए।
डॉ मिथलेश चौधरी के भ्रष्टाचार की परत अगले अंक और विस्तार से...
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0