दीपावली के बाद अन्नकूट पर्व पर छुट्टी न मिलने से छत्तीसगढ़ में नाराजगी का माहौल, लोगों ने कहा – “धर्म और परंपरा पर आघात”

दीपावली के बाद अन्नकूट पर्व पर छुट्टी न मिलने से छत्तीसगढ़ में नाराजगी का माहौल, लोगों ने कहा – “धर्म और परंपरा पर आघात”
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दीपावली के बाद अन्नकूट पर्व पर छुट्टी न मिलने से छत्तीसगढ़ में नाराजगी का माहौल, लोगों ने कहा – “धर्म और परंपरा पर आघात”

दीपावली के बाद अन्नकूट पर्व पर छुट्टी न मिलने से छत्तीसगढ़ में नाराजगी का माहौल, लोगों ने कहा – “धर्म और परंपरा पर आघात”

रायपुर | 23 अक्टूबर 2025 छत्तीसगढ़ में इस बार दीपावली के बाद मनाए जाने वाले अन्नकूट और मातर गोवर्धन पूजा पर्व पर महाविद्यालयों में छुट्टी घोषित न किए जाने को लेकर व्यापक नाराजगी देखने को मिल रही है। प्रदेश के शिक्षण संस्थानों में छात्रों और अभिभावकों से लेकर आम जनता तक सरकार के इस निर्णय पर असंतोष जता रहे हैं। यह पहला मौका है जब पिछले 25 वर्षों में अन्नकूट पर्व पर कोई अवकाश नहीं दिया गया।

लोगों का कहना है कि छत्तीसगढ़ एक पारंपरिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य है, जहाँ दीपावली के अगले दिन अन्नकूट, गोवर्धन पूजा और मातर पर्व विशेष रूप से मनाया जाता है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि लोकसंस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। ऐसे में इस दिन छुट्टी न देना लोगों की भावनाओं को आहत कर गया है।

 अन्नकूट और गोवर्धन पूजा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

अन्नकूट पर्व का अर्थ है — ‘अन्न का पर्वत’। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र के कोप से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाया था। उसी उपलक्ष्य में लोग अन्नकूट बनाकर भगवान को भोग लगाते हैं और गोवर्धन की पूजा करते हैं। छत्तीसगढ़ में यह पर्व गाँवों और नगरों में विशेष उल्लास के साथ मनाया जाता है।

गौमाता की पूजा, खेतों की उपज से बने व्यंजनों का अन्नकूट रूप में भोग, और सामूहिक भोज — यह सब इस पर्व की विशिष्ट परंपराएँ हैं। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था से, बल्कि प्रकृति, अन्न और कृषि संस्कृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक भी है।

 लोगों की नाराजगी और सवाल

छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों का कहना है कि अन्नकूट और मातर पूजा जैसे पर्वों पर छुट्टी न देना एक बड़ी भूल है। रायपुर के एक कॉलेज छात्र ने कहा, “दीपावली के अगले दिन हम घर में अन्नकूट का आयोजन करते हैं, यह सालों पुरानी परंपरा है। लेकिन इस बार कॉलेज खुलने से हम त्योहार का आनंद नहीं ले पाए।”

वहीं रायगढ़ और बेमेतरा जैसे जिलों से भी ऐसी ही प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। लोगों का कहना है कि हिंदू परंपरा और आस्था पर विश्वास जताने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार से ऐसी अपेक्षा नहीं थी। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखा कि “यह निर्णय जनता की भावनाओं के विपरीत है।”

 भाजपा सरकार पर उठे सवाल

आलोचकों का कहना है कि ‘हिंदुत्व’ की बात करने वाली सरकार ने इस बार अपने ही सिद्धांतों को दरकिनार कर दिया है। जनता का आरोप है कि सरकार के प्रशासनिक अधिकारी इस मामले में लापरवाह हैं और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को गलत सलाह दे रहे हैं।

कई लोगों ने तुलना करते हुए कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की कांग्रेस सरकार में छत्तीसगढ़ी परंपराओं और त्यौहारों का विशेष ध्यान रखा जाता था। “भूपेश सरकार छत्तीसगढ़ की संस्कृति को सम्मान देती थी, आज उसी संस्कृति की उपेक्षा हो रही है,” – यह भावना आम लोगों में देखी जा रही है।

 धर्म और आस्था पर चोट की बात

धार्मिक संगठनों और सांस्कृतिक संस्थाओं ने भी उच्च शिक्षा विभाग से मांग की है कि भविष्य में ऐसे निर्णय सोच-समझकर लिए जाएँ। उनका कहना है कि त्योहारों पर छुट्टी केवल आराम के लिए नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने का प्रतीक है।

कई बुद्धिजीवियों ने यह भी कहा कि अन्नकूट जैसे पर्वों पर छुट्टी न देना “आस्था और लोक परंपरा के साथ अन्याय” है।

 जनता की अपील

जनता ने राज्य सरकार और उच्च शिक्षा विभाग से मांग की है कि इस निर्णय की समीक्षा की जाए और आने वाले वर्षों में अन्नकूट, गोवर्धन पूजा और मातर पर्व को राज्य स्तरीय मान्यता के साथ अवकाश सूची में पुनः शामिल किया जाए।

लोगों का कहना है कि शासन की प्राथमिकता केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि जनभावनाओं और संस्कृति के सम्मान पर भी आधारित होनी चाहिए।

मायने

छत्तीसगढ़ में अन्नकूट केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि लोकजीवन की आत्मा से जुड़ा उत्सव है। इस परंपरा की अनदेखी ने जनता के भीतर असंतोष की लहर पैदा कर दी है। राज्य की जनता अब उम्मीद कर रही है कि सरकार इस चूक को स्वीकार करेगी और भविष्य में ऐसे निर्णय सांस्कृतिक संवेदनशीलता के साथ लेगी।

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