मोहन भागवत की परशुराम पर टिप्पणी से उपजा विवाद, विप्र समाज में भारी आक्रोश

Mohan Bhagwat's comment
 0
मोहन भागवत की परशुराम पर टिप्पणी से उपजा विवाद, विप्र समाज में भारी आक्रोश

मोहन भागवत की परशुराम पर टिप्पणी से उपजा विवाद, विप्र समाज में भारी आक्रोश

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत द्वारा भगवान परशुराम को लेकर की गई एक टिप्पणी ने देशभर में विवाद खड़ा कर दिया है। इस बयान के सामने आते ही विप्र समाज में गहरा आक्रोश देखने को मिला और कई स्थानों पर कड़ा विरोध दर्ज कराया गया। समाज के प्रबुद्धजनों, धार्मिक संगठनों और ब्राह्मण समाज से जुड़े नेताओं ने इसे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है।

विवाद की जड़ मोहन भागवत का वह वक्तव्य है, जिसमें उन्होंने भगवान परशुराम के संदर्भ में सामाजिक विमर्श के दौरान एक टिप्पणी की। हालांकि संघ की ओर से इसे व्यापक सामाजिक संदर्भ में कही गई बात बताया जा रहा है, लेकिन विप्र समाज का कहना है कि यह बयान भगवान परशुराम के चरित्र, उनके योगदान और ब्राह्मण समाज की ऐतिहासिक भूमिका को कमतर दिखाने वाला है। इसी कारण यह टिप्पणी अस्वीकार्य है।

भगवान परशुराम को हिंदू धर्म में चिरंजीवी माना जाता है और वे विष्णु के छठे अवतार के रूप में पूजित हैं। उन्हें अन्याय और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष करने वाले महायोद्धा, तपस्वी और धर्मरक्षक के रूप में जाना जाता है। विप्र समाज का कहना है कि परशुराम केवल ब्राह्मण समाज के ही नहीं, बल्कि संपूर्ण सनातन संस्कृति के गौरव हैं। ऐसे में उनके बारे में किसी भी प्रकार की विवादित टिप्पणी समाज की भावनाओं को आहत करती है।

देश के कई हिस्सों में विप्र समाज के संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किए। जगह-जगह ज्ञापन सौंपे गए और मोहन भागवत से सार्वजनिक रूप से माफी की मांग की गई। सामाजिक मंचों और धार्मिक सभाओं में भी इस मुद्दे पर तीखी चर्चाएं हो रही हैं। कई संत-महात्माओं ने भी बयान की निंदा करते हुए कहा कि समाज में समरसता बनाए रखने के लिए सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों को शब्दों के चयन में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

विप्र समाज के नेताओं का कहना है कि यह पहला अवसर नहीं है जब किसी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति के बयान से धार्मिक भावनाएं आहत हुई हों। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस मामले में स्पष्टता और संवेदनशीलता नहीं दिखाई गई, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। कुछ संगठनों ने इसे राजनीतिक और वैचारिक एजेंडे से जोड़कर भी देखा है, हालांकि संघ समर्थकों ने इन आरोपों को निराधार बताया है।

आरएसएस से जुड़े सूत्रों का कहना है कि मोहन भागवत का उद्देश्य किसी समाज या महापुरुष का अपमान करना नहीं था। उनके बयान को संदर्भ से हटकर प्रस्तुत किया गया है। संघ का तर्क है कि उनका विचार सामाजिक समरसता और ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित था, लेकिन शब्दों की व्याख्या अलग-अलग तरीके से की जा रही है। इसके बावजूद, संगठन ने यह भी स्वीकार किया है कि यदि किसी की भावनाएं आहत हुई हैं, तो संवाद के माध्यम से स्थिति को स्पष्ट किया जाना चाहिए।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्तियों को धार्मिक और ऐतिहासिक विषयों पर बोलते समय कितनी सावधानी रखनी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक देश में किसी भी प्रतीक, देवी-देवता या महापुरुष पर टिप्पणी समाज में तनाव पैदा कर सकती है।

फिलहाल, मोहन भागवत की टिप्पणी को लेकर विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। विप्र समाज अपने रुख पर अडिग है और स्पष्ट माफी या स्पष्टीकरण की मांग कर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संघ और समाज के बीच संवाद से यह विवाद सुलझता है या फिर यह मुद्दा और अधिक तूल पकड़ता है।

What's Your Reaction?

Like Like 1
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0