Pappu's 'Simba' beer and the BJP's पप्पू का ‘सींबा’ बियर और भाजपा की अंदरूनी जंग छत्तीसगढ़ में शराब से सियासत तक बवाल ‘

Pappu's 'Simba' beer and the BJP's

Jan 10, 2026 - 22:50
Jan 10, 2026 - 23:03
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Pappu's 'Simba' beer and the BJP's पप्पू का ‘सींबा’ बियर और भाजपा की अंदरूनी जंग छत्तीसगढ़ में शराब से सियासत तक बवाल ‘

पप्पू का ‘सींबा’ बियर और भाजपा की अंदरूनी जंग छत्तीसगढ़ में शराब से सियासत तक बवाल

छत्तीसगढ़ में इन दिनों शराब बाजार से लेकर राजनीतिक गलियारों तक एक ही नाम की चर्चा है— पप्पू का ‘सींबा’ बीयर। राज्य की लगभग हर शराब दुकान में यही ब्रांड प्रमुखता से नजर आ रहा है। पीने और पिलाने वालों को मानो कोई दूसरा विकल्प ही नहीं मिल रहा। यह वही ब्रांड है, जिसने कांग्रेस शासन के दौरान भी खूब सुर्खियां बटोरी थीं और कथित शराब घोटालों में इसकी भूमिका को लेकर कई सवाल उठे थे।

तब यह ब्रांड कांग्रेस कोषाध्यक्ष रामगोपाल के जरिए सरकारी दुकानों में पहुंचा था। आरोप थे कि इस ब्रांड के माध्यम से पार्टी फंड और अन्य लेन-देन का खेल खेला गया। अब सत्ता बदल गई है, लेकिन कहानी के किरदार बदलने के बावजूद स्क्रिप्ट वही नजर आ रही है। इस बार ‘सींबा’ को भाजपा के कोषाध्यक्ष राम गर्ग के जरिए बाजार में उतारा गया है।

फंड, फायदे और फजीहत

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि ‘सींबा’ के जरिए होने वाली मोटी कमाई को इधर-उधर कर पार्टी फंड मजबूत करने की कोशिश की जा रही है। यह भी कहा जा रहा है कि पुराने मॉडल पर ही काम हो रहा है—जहां ब्रांड की जबरन सप्लाई, ज्यादा मार्जिन और चुनिंदा लोगों को लाभ पहुंचाने की रणनीति अपनाई गई।

मामला जैसे ही सामने आया, भाजपा के भीतर हलचल तेज हो गई। कई पदाधिकारी नाराज बताए जा रहे हैं। उनका कहना है कि पार्टी का कोष मजबूत करने के लिए शराब जैसे विवादित माध्यम का सहारा लेना नैतिक और राजनीतिक दोनों ही लिहाज से गलत है। अंदरखाने यह भी कहा जा रहा है कि इससे पार्टी की छवि को नुकसान पहुंच सकता है।

रामू’ की सफाई और अंदरूनी असंतोष

भाजपा कोषाध्यक्ष राम गर्ग, जिन्हें पार्टी के भीतर ‘रामू’ कहा जाता है, खुद को पूरी तरह ईमानदार बता रहे हैं। उनका तर्क है कि पार्टी कोष की रक्षा और उसे बढ़ाना उनकी जिम्मेदारी है, और वे वही कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या शराब कारोबार से जुड़े विवादों में पड़कर पार्टी को मजबूत किया जा सकता है?

कुछ पदाधिकारी खुलकर यह कहने लगे हैं कि यदि पार्टी को संसाधन जुटाने ही हैं, तो उसके लिए पारदर्शी और सम्मानजनक रास्ते अपनाए जाएं। शराब से जुड़ा पैसा पार्टी के लिए लंबे समय में भारी पड़ सकता है।

सरकार भी चुप, सिस्टम भी मौन

मामले पर शासन के प्रतिनिधि भी खुलकर कुछ कहने से बच रहे हैं। हर दुकान पर ‘सींबा’ की पेटियां धड़ल्ले से बिक रही हैं। इससे सेल्समैन से लेकर सप्लाई चेन से जुड़े कई लोगों की कमाई बढ़ गई है। चर्चा है कि पार्टी के कुछ बड़े नेताओं तक इसका लाभ पहुंच रहा है।

यह भी आरोप हैं कि राम गर्ग अपने पद को सुरक्षित रखने के लिए करोड़ों की पेशगी देने जैसी व्यवस्थाओं में जुटे हैं। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

इतिहास की परछाईं और भविष्य का डर

राजनीतिक विश्लेषक इस पूरे मामले को इतिहास से जोड़कर देख रहे हैं। वे याद दिलाते हैं कि एक ‘राम’ के फैसलों और विवादों ने पहले भी सरकार को मुश्किल में डाल दिया था। अब दूसरे ‘राम’ का रास्ता भी कहीं उसी दिशा में जाता दिख रहा है। यही डर भाजपा के भीतर कई नेताओं को सता रहा है।

सूत्रों के मुताबिक, मामला जब एक बड़े नेता और राम गर्ग के पुराने मित्र तक पहुंचा, तो उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने कहा, “लखन को बता दो, वह संभाल लेंगे।” लेकिन पार्टी के भीतर इसे हल्के में लेने की मानसिकता को लेकर असंतोष गहराता जा रहा है।

चुनावी गणित और ‘सींबा’ की भूमिका

राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि आने वाले पश्चिम बंगाल चुनावों के लिए फंड जुटाने की तैयारी के तहत ही ‘सींबा’ जैसे ब्रांड को बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार पहले ही शराब से कमाई के कई रास्ते खोल चुकी है—लाइसेंस बढ़ाए गए हैं, दुकानों की संख्या में इजाफा हुआ है, और नियमों में ढील दी गई है।

अब सवाल यह है कि ‘सींबा’ आने वाले समय में भाजपा के लिए वरदान बनेगा या विवादों की वजह।

फिलहाल इतना तय है कि पप्पू का ‘सींबा’ सिर्फ एक बीयर ब्रांड नहीं रहा, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की राजनीति में शक्ति, पैसा और सत्ता के समीकरणों का प्रतीक बन चुका है।

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